चुनाव से सेहत का मुद्दा गायब, कोरोना काल में जमीन पर हो रहा इलाज, बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच का है यह हाल

 

बेड नहीं होने पर मरीजों का फर्श पर ही इलाज किया जाता है।

  • चुनाव की घोषणा से ठीक पहले नीतीश कुमार ने 30 बेड के हाईटेक इमरजेंसी वार्ड का उद्घाटन तो कर दिया पर वहां नहीं हो रहा इलाज
  • इमरजेंसी वार्ड की क्षमता 200 बेड की है पर हर दिन आ रहे 400 से अधिक मरीज, एनएमसीएच का भी हाल खराब

जमुई से इलाज कराने पटना आई 45 साल की रामा देवी के पास पैसा होता तो वह भी किसी निजी अस्पताल में बेड पर होती। गरीबी और लाचारी के कारण सरकारी अस्पताल ही इलाज का सहारा है। वह अकेली नहीं, सैकड़ों ऐसे मरीज हैं जिन्हें अस्पताल में बेड नहीं मिल पाता है। बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं का यह हाल किसी से छिपा नहीं है। पटना मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी वार्ड की क्षमता 200 बेड की है और हर दिन 400 से अधिक मरीज आ रहे हैं। दोष व्यवस्था का है या बीमारी का जो गरीबों की जान पर भारी पड़ रही है। स्वास्थ्य सुविधाओं की जर्जर हालत किसी से छिपी नहीं है, इसके बाद भी चुनाव में गरीबों की सेहत का मामला बड़ा मुद्दा क्यों नहीं बनता?

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल का दर्द
पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) काफी पुराना है। वर्ष 1925 में इसकी स्थापना हुई थी। तब इसका नाम प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज था। पीएमसीएच की गिनती भारत के चर्चित मेडिकल संस्थानों में होती थी। प्रदेश के कोने-कोने से मरीज यहां इलाज के लिए आते थे। लेकिन अब संसाधनों का अभाव होने के कारण मरीजों को काफी परेशानी होती है। इमरजेंसी से लेकर जनरल वार्ड तक बेड की कमी है। मरीजों को वापस नहीं कर सकते हैं, ऐसी व्यवस्था है। इस कारण बेड नहीं होने पर मरीजों का फर्श पर ही इलाज किया जाता है।

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल काफी पुराना है। वर्ष 1925 में इसकी स्थापना हुई थी।

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल काफी पुराना है। वर्ष 1925 में इसकी स्थापना हुई थी।

मरीजों की संख्या के आधे भी नहीं हैं बेड
पीएमसीएच में हर दिन आने वाले मरीजों के हिसाब से बेडों की संख्या आधी भी नहीं है। सर्जरी विभाग में बेड की संख्या 301, हड्‌डी विभाग 86, प्लास्टिक सर्जरी में 36, आंख विभाग में 101, चर्म एवं रति विभाग 50, कान-नाक-गला विभाग में 60, कॉटेज अस्पताल में 32, स्त्री एवं प्रसव विभाग में 243 और शिशु रोग विभाग में बेडों की संख्या 264 है। पटना मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी में बेड की संख्या भी 200 है और मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

संक्रमण के खतरे में इलाज
पटना मेडिकल कॉलेज में मरीजों का इलाज जमीन पर करने से संक्रमण का खतरा बना रहता है। राजेंद्र सर्जिकल वार्ड से लेकर टाटा वार्ड में यही हाल है। मरीजों के लिए बेड नहीं होता है जिससे इलाज के लिए उन्हें जमीन पर ही लिटा दिया जाता है। लॉकडाउन के बाद अब सितंबर माह से मरीजों की संख्या बढ़ी है। जमीन पर इलाज से संक्रमण का खतरा होता है, क्योंकि पटना मेडिकल कॉलेज में साफ-सफाई को लेकर भी आरोप लगता रहा है।

आनन-फानन में उद्घाटन
सीएम नीतीश कुमार ने चुनाव की घोषणा से ठीक पहले आनन-फानन में पटना मेडिकल कॉलेज में बनाए गए 30 बेड के हाईटेक इमरजेंसी वार्ड का शुभारंभ कर दिया। पीएमसीएच में 22 सितंबर को वर्चुअल कार्यक्रम के माध्यम से हुए शुभारंभ के बाद भी मरीजों को इमरजेंसी का लाभ नहीं मिल रहा है। पीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. बिमल कारक का कहना है कि मरीजों की संख्या बढ़ने से समस्या हो रही है। मरीजों को वापस नहीं किया जा सकता है, इस कारण से उन्हें भर्ती करके जान बचाई जाती है।

नालंदा मेडिकल कॉलेज ने भी डुबोई नाव
नालंदा मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था तो पूरे देश में चर्चा में रही है। इमरजेंसी वार्ड के साथ आईसीयू में भी पानी भरने की घटना आम बात है। वार्ड में मछलियां तैरने का वीडियो तो पूरे देश में वायरल हुआ था। नालंदा मेडिकल कॉलेज में ऐसी समस्या के साथ बेडों की भी संख्या कम है। इस कारण बाहर से आने वाले मरीजों को समस्या होती है।

 

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