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गाय-भैंसों से ही 75 लाख रुपये सालाना कमाकर पढ़े-लिखों की प्रेरणा बनी,खुद पढ़ नहीं पाई गांव की यह औरत..!

एक ऐसा काम जो आज के पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित युवाओं को खुद का बिजनेस शुरू करा सकता है और या फिर उन्हें जीवन में कुछ नया करने के लिए मार्गदर्शित कर सकता है, वह काम गुजरात की कानुबेन पटेल कर रही हैं। कानुबेन एक ग्रामीण स्त्री हैं और अनपढ़ हैं। किंतु वह पढे-लिखे लोगों के लिये प्रेरणा का स्त्रोत हैं। वह गुजरात में बनासकांठा जिले में धानेरा स्थित चारडा गांव में रहती हैं।

यह गावं राजस्थान राज्य के निकट पड़ता है। यहां कानुबेन पशुपालन का व्यवसाय करती हैं। जिनमें उनके पास गाय मुख्य पशु हैं। जिनके जरिए, उन्हें सालाना 75 लाख रुपए तक की कमाई हो रही है। उनकी देखा-देखी आस-पड़ोस के इलाकों में भी लोगों ने ऐसे ही व्यवसाय शुरू कर दिए हैं। उनके इस व्यवसाय में उच्च तकनीक एवं आधुनिक तरीके से काम किया जा रहा है।

सालाना 75 लाख रुपये कमाती है ये अनपढ़ औरत

कानुबेन का पूरा नाम कानुबेन रावतभाई चौधरी है। कड़ी मेहनत और ठोस कार्यशैली के बल पर उन्होंने अपना व्यवसाय विकसित किया। कुछ वर्ष पहले, सिर्फ आठ से दस मवेशियों से शुरू किया गया यह व्यवसाय अब 80 से अधिक शंकर गायों और 40 भैंसों के जरिए दूध उत्पादित करता है। प्रतिदिन 600 से 1000 लीटर दूध बनास डेयरी में भेजा जाता है। इस दुग्ध व्यवसाय से प्रति माह 6 लाख रुपये कमाई हो जाती है।

हर सुबह नौ घंटे में जानवरों को फव्वारे के नीचे लाते हैं

वह कहती हैं कि मेरे यहां पशुओं के लिए पीने के साफ पानी और भोजन की भी प्रमुख व्यवस्था की गई है। प्रत्येक सुबह नौ घंटे में जानवरों को फव्वारे से नहलाया जाता है और खुले कंटेनर में रखते हुए उन्हें साफ किया जाता है। मवेशियों के निपटान के लिए दिए गए हरे और सूखे चारे को काटने के लिए एक मोटर चालित चाफटर की सुविधा है। पशुधन के लिए हरी घास पाँच एकड़ भूमि में लगाई जाती है।

पंखे और नहलाने की अच्छी व्यवस्था है

इतनी बड़ी संख्या में जानवरों का प्रबंधन करने के लिए आनंद डेयरी और बनास डेयरी के मार्गदर्शन के साथ पंजाब के पैटर्न के तहत, पंजाब परिहार द्वारा व्यवस्था की गई है। जिसमें 10 पशुओं को स्वचालित दूध देने वाली मशीन द्वारा दूध डेयरी में जाता है। गर्मी के मौसम में पशुओं को गर्मी से बचाने के लिए पंखे और कोहरे की व्यवस्था की गई है।

सुबह और शाम दूध डेयरी के लिये जाता है

चारे की कमी के वक़्त, हरी घास के अचार (साइलेज) के इस्तेमाल से पर्याप्त दूध उत्पादन प्राप्त होता है। जब कम मवेशी होते थे, तो दूध भरने के लिए गांव के दूध क्लब में जाना पड़ता था। अब दूध का दुहनी-केंद्र खेत के पास है, जिससे सुबह और शाम दूध डेयरी के लिये जाता है।

मुख्यमंत्री ने नवाजा और भी कई पुरस्कार मिले

कानुबेन चौधरी को देहाती पेशे में उत्कृष्ट काम के लिए कई पुरस्कार मिले हैं। वर्ष-2016 में बान्ड डेयरी पालनपुर द्वारा बानस लक्ष्मी पुरुस्कार, वर्ष 2017 में एनडीडीबी आनंद द्वारा उत्कृष्ट स्त्री दुग्ध उत्पादक पुरस्कार, बानस डेयरी द्वारा बानस लक्ष्मी अवार्ड, पशुपालन विभाग द्वारा बेस्ट एनिमल वेटरन सर्टिफिकेट, आर्बुदा युवा फाउंडेशन धनेरा द्वारा सर्वश्रेष्ठ पशु चिकित्सा प्रमाणपत्र दिया गया। महिंद्रा समृद्धि, अहमदाबाद द्वारा कृषि प्रेरणा सम्मान और महान्रा फाउंडेशन गुजरात के गौरव का एक पुरस्कार से भी उनको नवाजा गया है। पालनपुर में 69वें गणतंत्र दिवस के मौका पर मुख्यमंत्री विजय रुपाणी द्वारा कानुबेन को सम्मानित किया गया।

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