कौन हैं रंभा जिनके नाम पर है तीज व्रत, जानिए पूजा विधि-व्रत कथा और शुभ मुहूर्त

नई दिल्लीः सुहागिन स्त्रियों के लिए विशेष व्रत रंभा तीज आज रखा जा रहा है. इस व्रत को ‘रंभा तृतीया’ भी कहते हैं. हिंदू धर्म में आस्था रखने वाली सुहागिन महिलाओं के लिए रम्भा तीज व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण है. इस दिन सुहागिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं.

इस व्रत को अप्सरा रंभा ने महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए किया था. इस व्रत को करने से शिव-पार्वती और देवी लक्ष्मी तीनों की कृपा मिलती है.
सुहागिन महिलायें इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा करके विशेष फल प्राप्त करती है.

 

जानिए रंभा तीज का शुभ मुहूर्त
ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 12 जून को शनिवार के दिन रात के 08 बजकर 19 मिनट से शुरू हो जाएगी और 13 जून को रविवार के दिन रात्रि के 09 बजकर 42 मिनट पर इसका समापन हो जाएगा. इस प्रकार से रंभा तीज का पर्व 13 जून को मनाया जा रहा है.

तृतीया तिथि का आरंभ- 12 जून शनिवार की रात में 08 बजकर 19 मिनट से
तृतीया तिथि समापन- 13 जून, रविवार की रात 09 बजकर 42 मिनट पर

 

यह है पूजा विधि, चूड़ियों की होती है पूजा
रंभा तीज के दौरान महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं. खासकर इस दिन चूड़ियों की पूजा की जाती है. सनातन धर्म के अन्य पर्वों की ही तरह रंभा तीज के दिन भी दान का भी बड़ा महत्व है. माना जाता है कि इस दिन सोलह श्रृंगार की वस्तुओं का दान करने से दांपत्य जीवन में खुशहाली आती है. रिश्तों में कड़वाहट कम होती है और प्रेम बढ़ता है.

इस तरह करें अनुष्ठान
इस दिन सुहागिन महिलायें प्रातःकाल उठकर स्नान करके व्रत एवं पूजा करने का संकल्प लें. पूजा स्थल पर पूर्व दिशा में मुंह करके साफ आसन पर बैठें. माता पार्वती और शिव भगवान की मूर्ति स्थापित करें. पहले गणेश भगवान की फिर शिव भगवान और माता पार्वती की पूजा अर्चना करें. पूजा में घी के पांच दीपक जलाएं.

 

पूजा के दौरान भगवान शिव पर चंदन, गुलाल और फूल समेत अन्य चीजें एवं माता पार्वती पर चंदन, हल्दी, मेहंदी, अक्षत, लाल फूल समेत सोलह श्रृंगार की वस्तुएं चढ़ाएं.

कौन हैं रंभा
रंभा का जिक्र पुराणों में अप्सरा रंभा के रूप में होता है. यह भी कहा जाता है कि पूर्व जन्म में रंभा मानवी थी और तृतीया तिथि के व्रत-पालन से उसे अतुलनीय सौंदर्य मिला था. शिव-पार्वती की कृपा और देवी लक्ष्मी के आशीष से रंभा का जन्म समुद्र से रत्न के रूप में हुआ था, वह देवी लक्ष्मी का ही एक अवतार मानी जाती हैं. उन्हें इंद्र की सभा में मौजूद रहने का सम्मान हासिल हुआ था. अप्सरा रंभा को यौवन और सुंदरता का अतुल्यनिय प्रतीक माना जाता है.

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