कोरोना ने भुलाए रिश्ते:कोई मां की मौत के बाद संस्कार करने ही नहीं पहुंचा तो कोई पिता की अस्थियां लिए बिना ही गांव लौट गया

 

कटाना साहिब गुरुद्वारे से अस्थियां विसर्जित करते समाजसेवी। - Dainik Bhaskar

कटाना साहिब गुरुद्वारे से अस्थियां विसर्जित करते समाजसेवी।

  • एनजीओ ने 137 मृतकों की अस्थियां विसर्जित की

अंतिम क्रिया का इंतजार कर रहे 137 मृतकों को आखिरकार आजादी मिली गई। कोरोनाकाल ने न सिर्फ देश के सिस्टम और सरकारों की नाकामी को सामने ला दिया है। बल्कि पारिवारिक रिश्तों की सच्चाई भी सामने ला दी। महामारी के इस दौर में जब परिवारों ने संक्रमित परिजनों को श्मशानघाट तक लाने और अंतिम संस्कार के दौरान सारे क्रिया कर्म करने से अपने हाथ खिंच लिए।

इस दौरान ट्रैफिक मार्शल्स ने आगे बढ़कर संक्रमित मृतकों के अंतिम संस्कार किए, लेकिन कई परिवारों ने अंतिम संस्कार के बाद भी रिश्ता नहीं निभाया। ये स्थिति सिर्फ गरीब परिवारों की ही नहीं, बल्कि अमीर परिवारों की भी यही गाथा है।

रामगढ़िया श्मशानघाट में पिछले सवा साल से भी ज्यादा समय से अलमारियों में पड़ी अस्थियां

कई लोगों ने रिश्तों को मानने के बजाय उन्हें यूं ही अलमारियों में छोड़ दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि ढोलेवाल स्थित रामगढ़िया श्मशानघाट में पिछले डेढ़ साल से भी ज्यादा ऐसी अस्थियां भी पड़ी रही, जिन्हें लेने के लिए न ही उनके परिवार आए न ही उनका विसर्जन हो सका। अंतिम क्रियाओं के लिए इसी तरह ये अस्थियां श्मशानघाट की अलमारियों में पड़ी रही।

मंगलवार को आखिरकार दुख भंजन सेवा सोसाइटी ने पूरे विधि-विधान से कटाना साहिब गुरुद्वारा और शिव मंदिर चहलां में अस्थियों का विसर्जन किया और अरदास-पाठ करवाया गयाओ। संस्था के अधयक्ष रणजोध सिंह ने बताया कि मृतकों के परिजनों को फोन करके भी कई बार अस्थियां ले जाने के लिए कहा गया, पर वह फिर भी नहीं आए। इस मौके पर रछपाल सिंह, पंडित पंकज शर्मा, राजेश कुमार बब्बू, ग्रंथी बलविंदर सिंह, चरनजीत सिंह चन्नी, महिंदर सिंह मठाड़ू मौजूद रहे।

बुजुर्ग महिला की भी अस्थियां नहीं लेने आया समृद्ध परिवार

कोरोना के कारण समृद्ध परिवार की 70 साल बुजुर्ग महिला की मौत हुई। बुजुर्ग का संस्कार भी परिवार ने नहीं किया। वहीं, जब अस्थियां लेने की बात आई तो भी परिवार नहीं आया। कई बार उन्हें संपर्क किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद मंगलवार को उस महिला का भी अंतिम संस्कार किया गया।

मालिक ने उठाया अंतिम संस्कार का खर्च

रणजोध सिंह ने बताया कि मई में एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार हुआ। वह कोविड शकी मरीज था। उसका इलाज और अंतिम संस्कार उसके मालिक ने ही करवाया। बेटा भी लुधियाना में रहता था, लेकिन अंतिम संस्कार के बाद बेटा घर लौट गया। न ही किसी को जानकारी दी न ही अपने पिता की अस्थियां लेकर गया।

​​​​​​​रणजोध सिंह ने बताया कि हर अस्थि के साथ इसी तरह की व्यथा जुड़ी है। उनके परिवार ने अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की सोची भी नहीं। हमने हिंदू-सिख दोनों ही धर्मों के मुताबिक अंतिम क्रियाएं करवाई ताकि मृतकों को आत्मिक शांति मिले।

 

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