कोरोनावायरस से अमेरिका में अल्पसंख्यकों के बच्चों पर बड़ा खतरा, गोरों के मुकाबले ब्लैक और हिस्पियन बच्चों की अधिक मौतें हुईं , CDC की रिसर्च में दावा

 

  • अमेरिका की सबसे बड़ी स्वास्थ्य एजेंसी सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की रिसर्च रिपोर्ट जारी
  • रिपोर्ट के मुताबिक, 21 साल से कम उम्र के अश्वेत और हिस्पियन बच्चों में कोरोना से मौत का खतरा ज्यादा

अमेरिका में अश्वेत और हिस्पियन बच्चों को कोरोना से मौत का खतरा ज्यादा है। अमेरिका की सबसे बड़ी स्वास्थ्य एजेंसी सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक, मौत का सबसे ज्यादा खतरा ऐसे 21 साल से कम उम्र के बच्चों को है।

CDC की रिसर्च कहती है, 12 फरवरी से लेकर 31 जुलाई तक कोरोना से 121 ऐसे बच्चों की मौत हुई जिनकी उम्र 21 साल से कम थी। इन 121 में से मात्र 17 श्वेत थे। वहीं, 35 अश्वेत और 54 हिस्पेनिक बच्चे थे।

कोरोना से कुल होने वाली मौतों में 75 फीसदी तक यही उम्र वर्ग शामिल है। 47 राज्यों के डाटा पर रिसर्च की करने के बाद यह रिपोर्ट जारी की गई है।

किस उम्र के बच्चों की मौत अधिक, ऐसे समझें
सीडीसी ने कोरोना से होने वाली बच्चों की कुल मौत के आंकड़े को उम्रवार समझाया है। इसके मुताबिक, एक साल से कम उम्र वाले बच्चों के मौत का आंकड़ा 10 फीसदी है। 1 से 9 साल तक के उम्र वाले बच्चों में यह आंकड़ा 20 फीसदी है। इसके अलावा सबसे ज्यादा खतरा 10 से 20 साल वालों को है।

क्यों बढ़े मामले

CDC के मुताबिक, जिन बच्चों की मौत अधिक हुई वो ऐसे परिवार से हैं जिनके पेरेंट्स वर्कर हैं या ऐसे पेशे से जुड़े हैं जिसमें सीधे तौर कोरोना का सामना करना पड़ रहा है। कम जगह वाले कमरों में रहना, खाने और रहने की किल्लत ने रिस्क और बढ़ाया है। ये आर्थिक तंगी से जूझने के साथ शिक्षा के दायरे से भी दूर हैं। इसलिए गोरों के मुकाबले अश्वेत और हिस्पेनिक बच्चों में मौत के मामले ज्यादा हैं।

मोटापे और अस्थमा का कनेक्शन मिला

रिपोर्ट कहती है, अमेरिका में कोरोना से मरने वाले 75 फीसदी से अधिक बच्चों में कम से कम एक मेडिकल कंडिशन रही है। इनमें मोटापा, फेफड़ों से जुड़ी बीमारी या अस्थमा सबसे कॉमन रहा है।

इंग्लैंड में भी मौत का सबसे ज्यादा खतरा अश्वेतों को

कुछ महीने पहले इंग्लैंड में कोरोनावायरस से जुड़े सरकारी आंकड़ों में अश्वेतों और एशियाई को सबसे ज्यादा खतरा बताया था। नेशनल हेल्थ सर्विसेज (एनएचएस) के अस्पतालों के मुताबिक, ब्रिटेन में कोरोनावायरस के संक्रमण और मौत का सबसे ज्यादा खतरा अश्वेत, एशियाई और अल्पसंख्यकों को है। संक्रमण के जो मामले सामने आए उसमें यही ट्रेंड देखने को मिला था। अस्पतालों से जारी आंकड़ों के मुताबिक, गोरों के मुकाबले अश्वेतों में संक्रमण के बाद मौत का आंकड़ा दोगुना है। अश्वेत, एशियाई और अल्पसंख्यकों को यहां बेम (BAME) कहते हैं जिसका मतलब है- ब्लैक, एशियन एंड माइनॉरिटी एथनिक।

एक हजार लोगों पर 23 ब्रिटिश और 43 अश्वेत लोगों की मौत

आंकड़े सामने आने के बाद सरकार ने इस असमानता की वजह समझने के लिए जांच शुरू कर दी है। ‘द टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एनएचएस के अस्पतालों ने जो आंकड़ा जारी किया था उसके मुताबिक, 1 हजार लोगों पर 23 ब्रिटिश, 27 एशियन और 43 अश्वेत लोगों की मौत हुई। एक हजार लोगों पर 69 मौतों के साथ सबसे ज्यादा खतरा कैरेबियाई लोगों के लिए हैं, वहीं सबसे कम खतरा बांग्लोदेशियों (22) को है।

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