अपने को खुश रखकर हम दूसरों में खुशियां बांट सकते हैं

सुख नहीं बल्कि दुख हमें जीवन जीने की बेहतर सीख देता है। सुख और दुख जीवन के एक सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। दुख हमें मुश्किलों से जूझने, विषम परिस्थितियों से निकलने और आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है। हमने मातम को हमेशा नकारात्मक रूप में देखने की आदत बना ली है जबकि शोक को सकारात्मक रूप में देखने की जरूरत है। महात्मा बुद्ध ने दुख को एक शाश्वत सत्य कहा है। हमें उससे काफी कुछ सीखना है।

आध्यात्मिकता के अनुसार व्यक्ति को मातम से दूर नहीं भागना चाहिए बल्कि इसके साथ कार्य करना चाहिए। इसका भेद खोलना चाहिए, इसका मुकाबला करना चाहिए और इसे बदलने का रास्ता ढूंढ़ना चाहिए। इसके साथ काम करने के लिए हमें दिव्य ऊर्जा में डुबकी लगानी चाहिए। अफसोस से होने वाले तनाव को कम करने का संकल्प लेना चाहिए। भगवद्गीता के अनुसार दुख और खुशी दोनों जीवन का हिस्सा हैं। आपको दोनों ही प्राप्त करना होता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप किसी की खराब स्थिति और स्वयं की बीमारी वाली स्थिति पर आनंद लेना शुरू कर दें। इसका मतलब यह है कि इसे आप सामान्य स्थिति की तरह लें। यह भाव दुख से उबरना और सुख में आनंद प्राप्त करना सिखाता है।

अपने समाज में कुछ न करने की प्रवृत्ति को हम नकारात्मक या बुरे रूप में ही देखते हैं। ऐसा सोचना हमारी आदत है। यह कहा जाता है कि जब हम कुछ नहीं करते या निष्क्रियता का परिचय देते हैं तब हम अपने अंदर के गुणों को नष्ट करते हैं। परंतु इस तरह की सोच से हमें घिरा नहीं रहना चाहिए। ऐसा कर हम अपना ही नुकसान कर रहे होते हैं। हमें अपने अंदर के गुणों को बचाकर रखने की जरूरत है। अपनी ताजगी, मुस्कराहट, आनंद और संवेदनशीलता इन सबको बचाकर रखना है। ऐसा करने पर ही हम किसी का मददगार बन सकते हैं। दिन भर में बहुत सारी भावनाएं होती हैं, जिन्हें हम महसूस करते हैं। उदासी उनमें से ही एक है। यह हमारे काले बादलों की तरह घेरे रखती है। यह स्थिति किसी नुकसान से गुजरने, किसी तरह का दर्द झेलने या दूसरों की पीड़ा देखने से शुरू हो सकती है। यह स्थिति जल्द ही खत्म हो सकती है या लंबी भी चल सकती है।

दरअसल हमारे गुण हमारे व्यक्तित्व के ही परिचायक हैं। जब हम आनंद में रहते हैं, तभी दूसरों को आनंदित रखने की कोशिश करते हैं। दूसरी ओर जब हम दुख की स्थिति में होते हैं, तब चुपचाप रहते हैं और किसी के प्रति ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते हैं। गीता के अनुसार हमें आत्मा यानी स्वयं को जानने की कोशिश करते हुए जीने का तरीका सीखना चाहिए। हमें यह जानना चाहिए कि हम शरीर नहीं हैं, शरीर के अंदर हैं। इसलिए सौभाग्य और दुख जो हम शरीर और मस्तिष्क से महसूस करते हैं, वे हमारी आत्मा पर असर नहीं डालते।

गीता का उद्देश्य इस पर आधारित है कि हम किसी प्रकार आनंद में रहें, कोई भी दुखी न रहे। इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मातम को भी आने दो, यह अपने आप किसी भी रास्ते से चला जाएगा क्योंकि हर चीज बदलती रहती है।

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