अखबारों-पत्रिकाओं में इस्तेमाल होने वाला कागज कोरोना वायरस से महफूज

वैज्ञानिक शोध में बताया गया है कि अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में इस्तेमाल होने वाला कागज कोरोना वायरस के खतरे से महफूज है। इससे सोशल मीडिया पर फैल रही उन अफवाहों पर विराम लग सकेगा, जिसमें बताया जा रहा है कि कोरोना वायरस अखबारों के जरिए फैल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पैसे कपड़े और हवा पास होने वाली चीजों पर वायरस लंबे समय तक जीवित नहीं रहता है। क्योंकि ऐसी चीजों में रिक्त स्थान या छेद सूक्षम जीव को फंसा सकते हैं और इसे प्रसारित होने से रोक सकते हैं।

शोध में बताया गया है कि खिड़की-दरवाजे, फर्नीचर, लिफ्ट के बटन, सीढि़यों की रेलिंग, पानी की बोतल और कांच के बर्तन छूने के बाद अपने हाथों को साबुन से जरूर धोएं। लकड़ी, कांच, प्लास्टिरक और धातु पर कोरोना वायरस के लंबे समय तक जीवित रहने के वैज्ञानिक प्रमाण के आधार पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह सलाह दी है।

‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना वायरस चिकनी और बिना छिद्र वाली सतहों पर सबसे लंबे समय तक टिका रहता है। इनमें लकड़ी, प्लास्टिक, कांच, स्टील, पीतल, तांबा शामिल हैं। वहीं, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की मानें तो स्टील और प्लास्टिक पर कोरोना वायरस तीन दिन तक जिंदा रहता है। अगर किसी व्यक्ति ने इन तीन दिनों में संक्रमित सतह को छू दिया तो वह भी कोरोना वायरस का शिकार हो सकता है।

इसी तरह ‘जर्नल ऑफ हॉस्पिटल इंफेक्शन’ में छपे एक अध्ययन में दावा किया गया है कि 20 डिग्री सेल्सियस तापमान पर कोरोना वायरस स्टील पर दो, लकड़ी-कांच पर चार और धातु-प्लास्टिक-चीनी मिट्टी से बनी चीजों पर पांच दिनों तक टिका रह सकता है। शोधकर्ताओं ने संक्रमण के प्रसार के अत्यधिक खतरे वाली सतहों को छूने के बाद हाथों को चेहरे पर ले जाने से बचने की नसीहत दी है।

 

उन्होंने चेताया कि कोरोना वायरस आंख, नाक और मुंह के रास्ते शरीर में प्रवेश कर सकता है। फेफड़ों में दस्तक के बाद इनसान का इससे बचना मुश्किल हो जाता है। शोधकर्ताओं ने संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील सतहों को समय-समय पर सैनेटाइज करते रहने के लिए कहा है। इसके अलावा हाथों को लगातार साबुन से धोते रहना या फिर सैनेटाइजर का इस्तेमाल करते रहना भी बेहद जरूरी है।

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