अंत भला तो सब भला, पढ़िए एक गरीब वनवासी की कहानी… !

एक राजा वन भ्रमण के लिए गया तो रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित होकर एक वनवासी की झोपड़ी पर जा पहुंचा. वहां से आतिथ्य मिला तो राजा बहुत खुश हुआ. चलते समय राजा ने उस वनवासी से कहा, हम इस राज्य के शासक हैं. तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर अमुख नगर का चन्दन बाग तुम्हें प्रदान करते हैं. उससे तुम्हारा जीवन आनन्दमय बीतेगा.

इसके बाद वनवासी उस परवाने को लेकर नगर के अधिकारी के पास गया और बहुमूल्य चन्दन का उपवन उसे प्राप्त हो गया. लेकिन चन्दन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, ये उसे नहीं मालूम था. इसलिए वनवासी चन्दन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा. इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था चलने लगी.

धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गए. एक अन्तिम पेड़ बचा. वर्षा के कारण वो कोयला न बन सका तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया. जब वो लकड़ी का गठ्ठा लेकर बाजार में पहुंचा तो सुगन्ध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया.

आश्चर्यचकित होकर वनवासी ने इसका कारण पूछा तो लोगों ने कहा, यह चन्दन है. बहुत मूल्यवान् है. यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो. ये सुनकर वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चाताप करने लगा कि उसने इतना बड़ा बहुमूल्य चन्दन वन कौड़ी मोल कोयले बनाकर बेच दिया.

पछताते हुए नासमझ को सांत्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा, मित्र पछताओ मत, जो तुमने किया है, ये तो सारी दुनिया कर रही है. जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है, पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदले कौड़ी के मोल में गंवाते रहते हैं. तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है, तुम अगर उसी का सदुपयोग कर लो तो ये भी कम नहीं होगा. बहुत गंवाकर भी कोई मनुष्य अन्त में संभल जाता है तो वो भी बुद्धिमान ही माना जाता है.

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