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लाउड स्पीकर का दुरुपयोग हमारे देश में आम बात है। प्रत्येक आयोजन में पूरी आवाज में लाउड स्पीकर बजाना आम बात है। धार्मिक अवसरों पर मंदिरों में भी पूरी आवाज से लाउड स्पीकर बजता है। शादी-ब्याह में भी गाने पूरी आवाज से बजाए जाते हैं। धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक जूलूसों में डीजे का पूरी क्षमता से उपयोग किया जाता है। उनकी पूरी आवाज से कमजोर दिल वालों को दिल का दौरा पड़ सकता है।

 

बीमार तो ठीक स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी उनकी धमाकेदार आवाज को सहन करना सम्भव नहीं होता। इसी तरह सभी मस्जिदों से लाउड स्पीकर की पूरी क्षमता से दिन में 5 बार अजान दी जाती है। यह सिलसिला सुबह करीब 5 बजे से प्रारम्भ होता है। इसकी आवाज सचमुच असहनीय होती है। अजान की इस आवाज का विरोध इसलिए है कि वह नियमित रुप से दिन में 5 बार दी जाती है। विरोध अजान का नहीं है, लाउड स्पीकर के दुरुपयोग का है।

 
यह पहली बार नहीं है कि लाउड स्पीकर के दुरुपयोग का विरोध हो रहा हो। मुम्बई में 1 से अधिक बार अजान के लाउड स्पीकर के दुरुपयोग के विरोध में सफलतापूर्वक आवाज उठाई गई है। बम्बई हाईकोर्ट मस्जिदों पर अजान के लिए लगाए गए लाउड स्पीकरों को हटाए जाने के आदेश पूर्व में भी दे चुका है। कई समझदार मुसलमान नेताओं ने इस आदेश का समर्थन किया है। एक सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में पता चला कि नवी मुम्बई में 49 मस्जिदों में से 45 के पास लाउड स्पीकर के उपयोग करने की अनुमति नहीं है। इस तरह बहुत लम्बे समय से ध्वनी प्रदुषण अधिनियम 2000 का अधिकतर मस्जिदों द्वारा उल्लंघन किया जाता है। लाउड स्पीकर की पूरी क्षमता से अजान देने से अजान का मूल उद्वेश्य समाप्त हो जाता है। मुस्लिम समाज के ज्ञानीजन भी कहते हैं कि अजान मधुर आवाज में होनी चाहिए। लाउड स्पीकर के दुरुपयोग से अजान कर्कश हो जाती है।

 
मननीय उच्चतम न्यायालय ने रिट पिटिशन (ब) नं. 72/1998 तथा सिविल अपील नं. 3735 /2005 में अपने निर्णय दिनांक 18 जुलाई 2005 में ध्वनी प्रदुषण रोकने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए हैं। उन्होंने आदेशित किया है कि “संविधान का अनुच्छेद 21 सभी व्यक्तियों को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की प्रत्याभूति प्रदान करता है। इस न्यायालय के तथा उच्च न्यायालयों के बारम्बार निर्णयों द्वारा भी सुस्थापित है कि अनुच्छेद 21 में परिकलपित प्राण का अधिकार केवल जीवित या अस्तित्व में रहने का नहीं है।

 

यह व्यक्तियों को मानवीय गरिमा के साथ प्राण का अधिकार प्रत्याभूत करता है, इसमें जीवन के उन सभी पहलुओं को शामिल किया गया है, जो व्यक्ति के जीवन को अर्थपूर्ण, परिपूर्ण और रहने योग्य बनाते हैं। मानव जीवन का अपना अलग ही आकर्षण है और ऐसा कोई कारण नहीं कि क्यों न जीवन का उपभोग सभी अनुज्ञेय आनंदों के साथ किया जाए। किसी भी व्यक्ति को, जो अपने घर के भीतर शांति, आराम और सीधे-साधे ढंग से रहना चाहता है, अपने पास प्रदुषण के रुप में पहुँचने वाली ध्वनी को निर्धारित करने का अधिकार है।

 

 

कोई भी व्यक्ति स्वयं के परिसर में भी ऐसी ध्वनी उत्पन्न करने के अधिकार का दावा नहीं कर सकता, जो उसके परिसर के क्षेत्र से बाहर जाती हो और पड़ोसियों और अन्य को उपताप कारित करती हो।” माननीय उच्चत्तम न्यायालय ने लिखा है कि अधिक ध्वनी लोगों के स्वास्थ के प्रति वास्तविक खतरा है। यह गम्भीर, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दबाव उत्पन्न कर सकता है। उन्होंने ध्वनी विस्तारक की आवाज की सीमा शौर-मानक 10 डी-बी (ए) या 75 डी-बी (ए) जो भी कम हो, ये अधिक नहीं होगा।

 
उपरोक्त निर्णयानुसार मंदिर, मस्जिद कहीं भी माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक आवाज में कोई भी ध्वनी विस्तारक नहीं बजा सकता। इसलिए सोनू निगम द्वारा उठाया गया प्रश्न भारतीय संविधान द्वारा दिए गए जीवन के मूल अधिकार के हनन से संबंधित हैं। कई समझदार मुसलमानों ने भी इस बात का समर्थन किया है कि अजान के लिए ध्वनी विस्तारक की आवाज कम होनी चाहिए।

 

यह प्रशंसनीय है वरना हमारे देश में धर्म के बारे में कुछ भी बोलना अनुचित माना जाता है। वास्तव में सभी धर्मों का स्वरुप बहुत विकृत हो गया है। अधिक से अधिक शौर मचाना ही धर्म माना जाने लगा है। सभी धर्मों के नेता मिलकर इस अनुचित दृष्टिकोण को बदल सकते हैं। जब ध्वनी विस्तारक यंत्र नहीं थे तब भी लोग मस्जिदों में समय पर पहुँचते थे। तब शायद अधिक लोग अधिक निष्ठा से, बिना कट्टरवाद के धर्म का पालन करते थे। ध्वनी प्रदुषण एक बड़ी सामाजिक समस्या है। इस समस्या का समाधान समाज के नेता और धर्म गुरु मिलकर कर सकते हैं। यही देश हित में है।