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नागरिकता संशोधन विधेयक : क्या है झूठ एवं वास्तविकता, जानें अंतर

नई दिल्ली : नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 सोमवार को लोकसभा में पारित हो गया और बुधवार को यह राज्यसभा में लाया जाएगा । सरकार का मानना है कि नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर जनता में कुछ भ्रांतियां हैं जिसे दूर किया जाना चाहिए । इस संबंध में पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की ओर से कई ट्वीट कर इससे जुड़ी भ्रांति और वास्तविकता की जानकारी दी है ।

पीआईबी के अनुसार विधेयक से जुड़ी झूठ और वास्तविकता इस प्रकार हैं।

झूठ- नागरिकता संशोधन विधेयक हिंदू बंगालियों को नागरिकता प्रदान करेगी।

वास्तविकता- नागरिकता संशोधन विधेयक स्वत: हिंदू बंगालियों को नागरिकता प्रदान नहीं कर सकती, यह विधेयक केवल छह अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित व्यक्तियों के लिए एक सक्षम कानून का निर्धारण करेगी। इस विधेयक को केवल मानवीय आधार पर प्रस्तावित किया गया है क्योंकि तीन देशों (पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान ) से धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर समुदायों को भगाया गया है।

झूठ- यह विधेयक असम के समझौते को कमजोर कर देगा ।

वास्तविकता- यदि अवैध शरणार्थियों को पकड़ने व वापस भेजने के लिए 24 मार्च 1971 की अंतिम तिथि की बात करें, तो यह विधेयक असम समझौते की मूल भावना को कमजोर नहीं करता है।

झूठ- नागरिकता संशोधन विधेयक से बांग्ला भाषी लोगों का प्रभुत्व बढ़ जाएगा।

वास्तविकता- हिंदू बंगाली जनसंख्या के अधिकांश लोग असम की बराक घाटी में रहते हैं और यहां बंगाली भाषा को राज्य की दूसरी भाषा का दर्जा दिया गया है। ब्रह्मपुत्र घाटी में, हिंदू-बंगाली अलग-अलग क्षेत्रों में रह रहे हैं और उन्होंने असमी भाषा को अपना लिया है।

झूठ- नागरिकता संशोधन विधेयक असम की स्थानीय जनता के हितों के खिलाफ है।

वास्तविकता- यह विधेयक असम पर केंद्रित नहीं है, यह भारत के हर राज्य में लागू होता है। यह विधेयक भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के खिलाफ भी नहीं है, बल्कि एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है ताकि स्वदेशी समुदाय के अवैध प्रवास को रोका जा सके।

झूठ- बंगाली हिंदू असम के लिए बोझ बन जाएंगे।

वास्तविकता- नागरिकता संशोधन विधेयक पूरे भारत देश के लिए सामान्य रूप से लागू है, धार्मिक रूप से उत्पीड़न सहने वाले लोग केवल असम में नहीं हैं बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी हैं।

झूठ- नागरिकता संशोधन विधेयक हिंदू बंगाली लोगों की जनजातीय लोगों की जमीन को हथियाना है।

वास्तविकता- हिंदू बंगाली जनसंख्या अधिकांश रूप से असम की बराक घाटी में रह रही है, जो कि आदिवासी क्षेत्र से दूर है। साथ ही नागरिकता संशोधन विधेयक आदिवासी जमीन के संरक्षण संबंधी किसी भी नियम अधिनियम को खंडित नहीं करती। नागरिकता संशोधन विधेयक उस स्थान पर लागू नहीं होता जहां इनर लाइन परमिट अथवा संविधान की छठी अनुसूची का प्रावधान है।

झूठ- नागरिकता संशोधन विधेयक के कारण बंग्लादेश से हिंदुओं का पलायन और बढ़ जाएगा।

वास्तविकता- बांग्लादेश से अधिकांश अल्पसंख्यक पहले ही विस्थापित हो चुके हैं, उत्पीड़न के स्तर में भी पिछले कुछ वर्षों में कमी आई है। बदले हुए स्वरूप में व्यापक रूप से धार्मिक प्रताड़ना के कारण पलायन के होने की संभावना बहुत कम है। 31 दिसंबर 2014 के बाद भारत प्रवास करने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिक संशोधन विधेयक के तहत लाभ नहीं मिल सकेगा।

झूठ- नागरिकता संशोधन विधेयक मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है।

वास्तविकता- किसी भी देश के किसी भी धर्म का कोई भी नागरिक भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है। यदि वह नागरिकता अधिनियम, 1955 के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार ऐसा करने के लिए पात्र है। नागरिकता संशोधन विधेयक इन प्रावधानों को बिल्कुल भी नहीं बदलता है। यह केवल तीन देशों के छह अल्पसंख्यक समुदायों के प्रवासियों को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने में सक्षम बनाता है और उनके आवेदन को गति देता है। यदि वे दिए गए मानदंडों को पूरा करते हैं।

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