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21 अप्रैल को हुए श्रीलंका के धमाकों से हमारा कोई लेना-देना नहीं है: TNTJ

नई दिल्ली/कोलंबो:श्रीलंका ईस्टर के मौके पर सिलसिलेवार आठ बम धमाकों से दहल उठा था। इस धमाके में 250 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी जबकि 500 से ज्यादा घायल थे। इस घटना की जिम्मेदारी बेशक आईएस ने ली थी लेकिन द्वीप देश के इस्लामिक संगठन नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) का इसके पीछे हाथ माना जा रहा है। श्रीलंका सरकार ने एनटीजे पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना ने अपनी आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एनटीजे और अन्य समूह जमाथेई मिल्लाथू इब्राहिम को प्रतिबंधित कर दिया। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एनटीजे 2014 में श्रीलंका तौहीद जमात (एसएलटीजे) से अलग होकर बना था।
एसएलटीजे एक प्रमुख मुस्लिम संगठन है जो कट्टरपंथ, इस्लाम के वहाबी वर्जन को फैलाता है। नस्लीय घृणा, बौद्ध धर्म के पूजा स्थल को तोड़ना और आईएस के हिंसक जिहाद को खुले तौर पर स्वीकारने का उसका ट्रैक रिकॉर्ड रहा है। 2016 में एसएलटीजे के महासचिव अब्दुल राजिक को हेट स्पीच की वजह से गिरफ्तार किया गया था। तमिलनाडु तौहीद जमात (टीएनटीजे) पर बम धमाकों के बाद से नजर रखी जा रही है। मीडिया में आई कई खबरों में उसपर बम धमाकों का आरोप लगाया गया था। वह एसएलटीजे का एक संबद्ध सहयोगी है। दोनों संगठनों ने कुरान के संस्करणों के अनुवाद और वितरण के लिए सक्रिय रूप से सहयोग किया है, जिसके जरिए उन्होंने वह संदेश फैलाने की कोशिश की है जो उनके अनुसार इस्लाम का सच्चा स्वरूप है।
एसएलटीजे ने श्रीलंका में टीएनटीजे के नेताओं को होस्ट किया है। धार्मिक विचारधारा से परे दोनों संगठन तमिल भाषा के जरिए आपस में जुड़े हुए हैं। श्रीलंका में मुस्लिमों की संख्या 10 प्रतिशत है। टीएनटीजे एक कट्टर धार्मिक संगठन है लेकिन इसका कहना है कि 21 अप्रैल को हुए धमाकों से उसका कोई लेना-देना नहीं है। बम धमाकों के बाद कई रिपोर्ट्स में टीएनटीजे को हमलों से जोड़ा गया था। जिसके बाद उसके नेताओं को मजबूरन एक प्रेस कांफ्रेस करके आरोपों का खंडन करना पड़ा। इसके अलावा उन्होंने हमले की निंदा करते हुए इसे गैर-इस्लामी बताया है।
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