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सिरसा : 2 उपचुनावों से गर्मा चुकी है सियासत

सिरसा:सिरसा की सियासत का मिजाज अनूठा है। अतीत के पन्नों में कई ऐसे रोचक किस्से-कहानियां एवं तथ्य हैं, जो जानकर हैरानी होती है। हरियाणा गठन से पहले यह संसदीय क्षेत्र पंजाब का हिस्सा था। देश आजाद होने के बाद साल 1951 में जब यहां पहले संसदीय चुनाव हुए तो यह संसदीय क्षेत्र पंजाब के फाजिल्का तक फैला था और इस सीट का नाम था ‘फाजिल्का-सिरसा’। पहले चुनाव में यहां से कांग्रेस के आत्मा सिंह ने 75,412 वोट हासिल करते हुए शिरोमणि अकाली दल के गुरराज सिंह को पराजित किया था। इस तरह से आत्मा सिंह यहां से पहले सांसद बने। रोचक पहलू यह है कि साल 1952 और उसके बाद 1988 में 2 दफा यहां उपचुनाव भी हो चुके हैं।

दरअसल सिरसा संसदीय क्षेत्र से कई रोचक किस्से जुड़े हैं। यहां साल 1952 में उपचुनाव हुआ। उस उपचुनाव में कांग्रेस के इकबाल सिंह ने 48,812 मत हासिल करते हुए जीत हासिल की। इसके बाद साल 1988 में तत्कालीन सांसद दलबीर सिंह के निधन के बाद उपचुनाव हुआ। कांग्रेस ने दलबीर सिंह की बेटी कुमारी शैलजा को मैदान में उतारा। पिता के निधन के बाद पुत्री को मैदान में उतार कांग्रेस सहानुभूति बटोरना चाहती थी। उस समय जनता दल की लहर थी।

इस लहर में जनता दल के हेतराम ने करीब 3 लाख 442 वोट हासिल करते हुए कुमारी शैलजा को करीब सवा लाख वोटों से पराजित किया। इससे इत्तर देखें तो हरियाणा गठन से पहले साल 1951, 1957 एवं 1962 में हुए सामान्य चुनावों में भी इस संसदीय क्षेत्र का स्वरूप बदलता रहा है। 1951 में फाजिल्का सिरसा सीट थी। 1957 के चुनाव में यह हिसार सीट के रूप में अस्तित्व में रही और उस चुनाव में ठाकर दास भार्गव ने जीत हासिल की। इसके बाद 1962 में हुए मनीराम बागड़ी ने जीत हासिल की। 1967 के चुनाव में पहली बार सिरसा नाम से यह सीट अस्तित्व में आई।

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