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शायरी: भरी महफ़िल मे मोहब्बत का ‪‎जिक्र‬ हुआ

बहुत ही शरारती है ये तेरी आवारा नथनी,

ज़ेवर का बहाना बना के तेरे होंठो को चूमती है।

ज़िंदा जो बच गए हैं सहे नफरतो के दुख,

अपना गला तो प्यार के खंज़र से कट गया।

ऐसे माहौल में दवा क्या है दुआ क्या है,

जहां कातिल ही खुद पूछे कि हुआ क्या है।

 

टूट पड़ती थीं घटाएं जिन की आँखें देख कर ,

वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए

मेरी साँसों की डोर बस दो ही ख्वाहिशो पर टिकी हैं,

साँस चले तो तुम साथ हो साँस रुके तो तुम पास हो।

भरी महफ़िल मे मोहब्बत का ‪‎जिक्र‬ हुआ,

हमने तो सिर्फ़ आप‬ की ओर देखा और लोग ‪‎वाह‬-वाह कहने लगे।

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