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वेस्ट बंगाल : दीदी नंबर 1, कांग्रेस-वामदलों के लिए अस्तित्व का संघर्ष

कोलकाता:राजनीति बंगालियों की सांसों में बसती है। आप चाहे कोलकाता की गलियों में चले जाएं, क्लब, बाजार या गांवों में, तमाम चर्चाएं राजनीति के आसपास ही घूमती नजर आएंगी। विभिन्न राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीतियों पर चर्चा करते हुए हर बंगाली आपको राजनीति का एक्सपर्ट नजर आएगा। बंगाल की राजनीति की दूसरी खास बात यह है कि यहां जाति मैटर नहीं करती। उत्तर भारत में खास तौर पर यूपी, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश में जातीय समीकरण के बारे में कमोबेश हर कोई जानता है। अगर आप वहां लोगों से बात करेंगे, तो जातीय गणित के आधार पर समीकरण और जीतने वाले उम्मीदवार के बारे में तुरंत बता देंगे, लेकिन अगर जाति के बारे में बात करेंगे, तो उनका सीधा जवाब होगा ‘मुझे नहीं पता’। यहां कैंडिडेट जाति के आधार पर नहीं चुना जाता।

बंगाल में मुख्य तौर पर त्रिकोणीय मुकाबला दिख रहा है। एक तरफ तृणमूल कांग्रेस है। दूसरी तरफ बीजेपी और तीसरी तरफ कांग्रेस-लेफ्ट दलों का अलायंस है। लंबी चर्चा के बाद और राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए सीपीएम और कांग्रेस करीब आए और उनके बीच अलायंस हुआ। बंगाल में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दोनों को साथ आना पड़ा। सीपीएम ने 34 वर्षों तक बंगाल पर राज किया, लेकिन अगर वह गठबंधन नहीं करती, तो उनके लिए एक लोकसभा सीट भी जीतना मुश्किल होता। कांग्रेस से गठबंधन के बाद सीपीएम दो सीट जीत सकती है। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों में यह आसान नहीं दिख रहा। सीपीएम के वोटर तृणमूल और बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो चुके हैं। वहीं, कांग्रेस तीन सीटों पर सफलता हासिल कर सकती है।

आज तक कोई बंगाली देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सका।
दिवंगत मुख्यमंत्री ज्योति बसु के सामने एक बार यह मौका आया था, लेकिन उस वक्त उनकी पार्टी ने ऐतिहासिक गलती की। ज्योति बाबू को प्रधानमंत्री बनने की इजाजत नहीं दी और यह मौका हाथ से चला गया। इस समय ममता इस रेस में हैं। उन्हें गंभीरता से लिया जा रहा है। वह विपक्षी एकता की महत्वपूर्ण शिल्पकार मानी जा रही हैं। ममता का गणित है कि पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद बीजेपी को 31 फीसदी वोट और 280 सीटें मिलीं। इस वक्त ऐसी कोई लहर नहीं है। बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के उदय ने कई राजनीतिक पंडितों को गलत साबित किया है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 17 फीसदी वोट मिले थे। दो साल बाद पार्टी का वोट शेयर गिरकर 10 पर्सेंट हो गया, लेकिन कांठी के उपचुनाव में बीजेपी को 32 फीसदी मत मिले और वह दूसरे स्थान पर रही। यह सीट बीजेपी के लिए कभी भी गढ़ नहीं रहा था। ऐसे में बीजेपी का प्रभाव बढ़ना असाधारण दिखता है।

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