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लखनऊ:मानव तस्करी को रोकने के लिये पीड़ित उतरे मैदान में, आईएलएफएटी की शुरूआत की

लखनऊ :  मानव तस्करी के पीड़ितों ने इसे खत्म करने के इरादे से इंडियन लीडरशिप फोरम अगेंस्टर ट्रैफिकिंग (आईएलएफएटी) की शुरूआत की है। इस मंच के जरिये मानव तस्करी के शिकार हो चुके लगभग लगभग ढाई हजार लोग तस्करी के विभिन्न रूपों जबरन और बंधुआ मजदूरी, यौन तस्करी, भीख, बाल वधु विवाह, घरेलू बंधक, ईंट और चूड़ी फैक्ट्रियों में काम करने वाले के खिलाफ जमीनी स्तर पर लड़ रहे है, और अब पीड़ित रहे लोगों ने नीति में बदलाव, शिक्षा एवं सशक्तिकरण के जरिये राष्ट्रींय स्तंर पर महत्वपूर्ण बदलाव लाने के लिए एक समन्वित रणनीति बनाने के लिए एक मंच पर एकत्र होने का निर्णय लिया है।

जिनका विभिन्न समूहों उत्थान (पश्चिम बंगाल), बंधन मुक्ति (पश्चिम बंगाल), विमुक्ति (पश्चिम बंगाल), बीजोयिनी (पश्चिम बंगाल), आईजेएम द्वारा सामूहिक रूप से समर्थित चैम्पियंस ग्रुप (पश्चिम बंगाल), ओडिशा माइग्रेंट लेबर एसोसिएशन (ओडिशा), जन जागरण मजदूर अधिकार मंच (छत्तीश्सगढ़), आजाद शक्ति अभियान (उत्तर प्रदेश), इरोड डिस्ट्रिक वूमन फेडरेशन (तमिलनाडु), विजेता (बिहार) और बिहान समूह (झारखंड) से आए पीड़ितों का मानव तस्करी के खिलाफ अभियान चलाने और तस्करी पीड़ितों के लिए न्याय तक पहुंच में सुधार लाने का एक साझा मिशन है।

भारत के विभिन्न हिस्सों से आए पीड़ितों के बीच प्रारंभिक परामर्श बैठकों के दौरान, चार प्रमुख स्पष्ट क्षेत्रों, जिन्हें तत्काल वकालती प्रयासों की आवश्यकता है, को चिन्हित किया गया। इन क्षेत्रों में पीड़ितों को मुआवजा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, अपराधियों को सजा दिलवाना और कलंक के खत्म करना प्रमुख है। विदित हो कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2016 में तस्करी किए गए प्रत्येक 5 में से 3 बच्चे (18 वर्ष से कम) थे। इनमें से 4911 (54 प्रतिशत) लड़कियां और 4123 (46 प्रतिशत) लड़के थे।

2016 में बंधुआ मजदूरी (45 प्रतिशत) के बाद वेश्या्वृत्ति के लिए यौन शोषण (22 प्रतिशत) मानव तस्करी के लिए दूसरा सबसे बड़ा कारण था। कानूनी ढांचे में कई कमियां हैं। मानव तस्करी के सभी मामले दर्ज नहीं किए जाते हैं, क्योंकि या तो इसमें माता-पिता खुद शामिल होते हैं या पीड़ित यह नहीं जानता कि कैसे मदद हासिल करे।

तस्करी के ठोस सबूत होने के बावजूद अक्सार अपहरण या गुमशुदा व्यसक्ति का मामला ही दर्ज किया जाता है। अपर्याप्त आंकड़े इस क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के कार्य में एक बाधा है। आंकड़ों की कमी से उच्च -प्रसार वाले क्षेत्रों का पता लगाना और लक्षित करना मुश्किल होता है, जिससे रोकथाम और कानून प्रवर्तन प्रयासों पर प्रभावी ढंग से ध्या न केंद्रित नहीं हो पाता है।

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