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योग क्या सिखाता है?

योग का पहला उल्लेख ऋगवेद में मिलता है, लेकिन इसके दर्शन, विज्ञान और व्याकरण से परिचय पतंजलि के ग्रन्थ पतंजलि योग सूत्र ने कराया। दुनिया में अब योग को माना जाता है। खुशी की बात है कि सब इसे स्वीकार कर रहे हैं। पोलिश सरकार ने अतंरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्लाय में इस दिवस को सफल बनाने की भरपूर कोशिश हुई। योग को पश्चिम भारतीय गुरु लेकर गए। वहां उन्होंने योग केन्द्र बनाए। लोग उस केन्द्र में आकर योगाभ्यास करने लगे। इससे उन्हें फायदा भी हुआ। इस वजह से योग बेहद लोकप्रिय हुआ। उसका तकरीबन 40 बिलियन डॉलर का बाजार बन चुका है। हालांकि योग का मतलब महज शारीरिक स्वास्थ्य नहीं है। वह इससे परे की चीज है। इस मायने में इंसानी शरीर बस काया मात्रा नहीं, उसमें मन है, बुद्धि है, और आत्मा है। योग इन तीनों को साधने की विधा है। इस प्रक्रिया में शरीर स्वत: स्वस्थ्य हो जाता है, बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है और मन इतना एकाग्र हो जाता है कि वह आत्मा और परमात्मा के संबंध को महसूस करने लगता है।

योग का मतलब महज शारीरिक स्वास्थ्य नहीं है। वह इससे परे की चीज है। इस मायने में इंसानी शरीर बस काया मात्र नहीं, उसमें मन है, बुद्धि है, और आत्मा है। योग इन तीनों को साधने की विधा है। इस प्रक्रिया में शरीर स्वत: स्वस्थ्य हो जाता है, बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है और मन इतना एकाग्र हो जाता है कि वह आत्मा और परमात्मा के संबंध को महसूस करने लगता है।

योग का मतलब ही जुड़ना है। इसका वास्तविक लक्ष्य ही होता है अंत चेतना और विश्व चेतना के तादात्म्य को जान लेना। योग हमें सीखाता है कि हम मानव और मानवता, मानव और पर्यावरण के बीच मौजूद बुनियादी एकता को समझे। लेकिन इसका चरम लक्ष्य यह है कि इन सबके परस्पर संबंध को मानव पहचान ले। जब इंसान समझ की इस पराकाष्ठा के शीर्ष पर पहुंच जाता है तो मैं और तुम का विभेद खत्म हो जाता है। उसके अंदर द्वैध बचता ही नहीं। वह समझ जाता है कि सब एक है। कहने का मतलब यह है कि वह चीजों को सम्रगता में देखने लगता है। बतौर शिक्षक मेरी कोशिश शिक्षा और वैश्विक विकास को समग्रता में देखनी की रही है। यही भारत की दार्शनिक और वैज्ञानिक परंपरा रही है। जगदीश चंद बसु ने सबसे पहले बताया कि पौधे, जानवर और मानव में कोई मूलभूत अंतर नहीं है।

डेकार्ट ने द्वैध की बात कही थी। हालांकि डार्विन के विकासवाद ने क ई न ए दर्शन को विकसित किया। लेकिन किसी ने दुनिया को समग्रता में नहीं देखा।वह दृष्टि तो महज श्रीअरविन्दो में थी। उन्होंने बताया कि जगत का विकास परमतत्व से हुआ है। सत और असत का कोई विभेद नहीं है। वैश्विकरण के इस दौर में समग्र दृष्टि की बहुत आवश्यकता है। इसके अभाव के कारण ही वैश्विक असंतुलन बना हुआ है। उसे दूर करना, इस ग्रह की सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिए जरूरत एक ऐसे प्रबुद्ध मस्तिष्क है जो वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोच सके। मौजूदा समय में इसकी बहुत जरूरत है। कारण, दुनिया जिस तरह के सकंट से गुजर रही है, उसका समाधान तकनीक में नहीं है। लेकिन भ्रम यही पाला गया है कि तकनीक मौजूदा सकंट से निपट सकती है।

पर वास्तव में ऐसा नहीं है। उसके लिए एक वैकल्पिक नजरिए का जरूरत है। सवाल यह है कि क्या योग को एक वैकल्पिक विश्व दृष्टिकोण के विकसित किया जा सकता है? क्या इसके जरिए मानव समाज को एक अहिंसक, पर्यावरण-अनुकूल, गैर-हठधर्मी, समतावादी, समावेशी, पंथनिरपेक्ष बनाया जा सकता है? इस संभावना पर प्रबुद्धजन गंभीरता से विचार कर रहे हैं। हमें भी योग से होने वाले सामान्य लाभ से इतर जाकर यह सोचना होगा कि अतंरराष्ट्रीय योग दिवस का उपयोग कैसे सुख,शांति और समृद्धि हासिल करने में किया जाए।

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