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ये चुनावी बोंड किसी जेम्स बोंड से कम नहीं, पता ही न चले की किसने की धन वर्षा…?

राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए मोदीजी की सरकार ने अनूठा रास्ता निकाला है। सरकारी बेंक में पैसे देकर चुनावी बांड लीजिये और राजनितिक दलों में बांटिये। बेंक को पता है की किसने ये चुनावी बांड खरीदें है। लेकिन भारत का आम मतदाता जिसका वोट लेने के लिए इतनी साड़ी मशक्कत करनी पड़ती है भिन्न भिन्न दलों को उस एक दिन के राजा समान मतदाता को इसकी भनक भी न लगे, उसे कानोंकान खबर भी न हो की भाजपा-कोंग्रेस समेत किस दलों को किसने बांटें..! ऐसा नहीं की किसी नेता ने यह चुनावी सभा में कहा हो। भारत सरकार के सबसे बड़े अधिवक्ता ने सब से बड़ी अदालत में ओन रिकार्ड कहा की राजनितिक दलों को चंदा देनेवालो के नाम या उसकी जानकारी से मतदाता को कोई लेनादेना नहीं। मतदाता ये जान कर क्या करेंगा की किसने कौन सी पार्टी को कितना दिया.! वाह रे वाह भाजपा की सरकार। अजब देरी माया गजब तेरा खेला..! मतदाता का कीमती और पावन वोट लेकर चुनावी नैया पार लगाकर सरकार बनानी है, अबजो खरबों का खर्चा करना है लेकिन अपने दल को किसने कितना चंदा दिया उसकी जानकारी नहीं देंगे..! ये पारदर्शी सरकार है क्या…?

ये तो भला हो सुप्रीमकोर्ट का की जिसने अधिवक्ता की दलील को नकारते हुए आदेश दिया की किसने कितना किस पार्टी को चंदा दिया उसकी जानकारी चुनाव् आयोग को दे। ये जानकारी चुनाव आयोग के बाद कोर्ट के जरिये आम लोगो तक भी पहुंचे की दाणी-अदानी-अम्बानी या कोई भी कम्पनी ने या पीढ़ी ने किस दल को कितन दिया ये मतदाता भी जान सके और किसे वोट देना वह भी तय कर सके। जाहिर भाजपा और एनी दलों को चंदा देनेवाली कम्पनिया भारत की ही है। इतना ही नहीं सरकार तो यह भी प्रावधान करना चाहती है की विदेशी कंपनिया भी भारत की राजनितिक दलों को चंदा दे सके। विदेशी कम्पनी को भारत में एकल पूंजीनिवेश से मनाई थी। अब विदेशी कम्पनी से भी चंदा चाहिए। ऐसा प्रावधान तो अभी नहीं हुवा लेकिन नहीं होंगा इसकी कोई गारंटी नहीं।

सरकार ने कोर्ट से कहा की बांड से राजनितिक चंदे में पारदर्शिता आएँगी।यह नकद का विकल्प है और रकम देनेवालो के नाम बेंक को पता है। माना की बेंक को पता है लेकिन बेंक किसी को यह नाम नहीं देंगी ऐसा भी एक प्रावधान किया गया है वह तो सरकार बताती नहीं…? बेंक को नाम पता है तो जाहिर करे। बेंक वाले बड़ी बड़ी लोन लेनेवालों के नाम भी न बताये और अब चुनावी बांड लेनेवाले के भी नाम पर पर्दा डाल दिया तो इसमें पारदर्शी कहाँ है…? बेंक को पता है लेकिन भारत के मतदाता को पता नहीं। लोकतंत्र में मतदाता अहम है। उसके बगैर लोकतंत्र ही नहीं। इसी मतदाता का एक वोट पाने के लिए नेतागण विमानों में उड़ रहे है, हेलीकॉप्टरों में उड़ रहे लेकिन दलों को किसने कितने पैसे दिए ये जानकारी आम मतदाता को नहीं देंगे..? आखिर क्यों सरकार ऐसे चंदा देनेवालो के नाम अपनीछाती से चिपकाएँ रखना चाहती है…?

मतदाता बड़ा की चंदा देनेवाला…? लगता है की भाजपा समेत सभी दलों के लिए मतदाता की कीमत सिर्फ वोट लेने तक ही सिमित है मतदाता तेरी इतनी कीमत या बोली लगाईं है राजनितिक दलों ने। समझ ले, संभल ले तेरा वजूद सिर्फ और सिर्फ तेरे वोट तक ही। दलों से चंदे के बारे में पूछना तेरा काम नहीं-तेरा नाम नहीं। नाम तो सिर्फ नीली नीली नोट देनेवाला का लिखा है दलों की तिजोरी में। तुम सिर्फ वोट दो और खिसक लो..! बस यही तेरा वजूद है..!

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