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मोटे अनाज और 50% मौसमी फल-सब्जी खाएं तो सुधरेगी धरती की सेहत,भारतीय थाली पर्यावरण के लिए भी अच्छी

मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का और रागी से भरपूर हमारी परंपरागत थाली सेहतमंद होने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी अच्छी है। दुनियाभर के 16 देशों के 37 वैज्ञानिकों ने 3 साल के अध्ययन के बाद यह निचोड़ निकाला है। ‘फूड प्लेनेट हेल्थ’ रिसर्च में हमने पाया कि भोजन में 50% हिस्सा मौसमी फल-सब्जियों का होना चाहिए। साथ ही ज्वार, मक्का, बाजरा जैसा मोटा अनाज भी होना चाहिए। 232 ग्राम मोटे अनाज में सबसे ज्यादा 811 कैलोरी होती है।

पर्यावरण और सेहत के तीन सबसे बड़े खतरे

  1. बढ़ती खेती खतरा है जैव विविधता के लिए

    खेती में 70% ताजे पानी का इस्तेमाल होता है। यानी वो पानी जो हम जमीन के अंदर, तालाब, नदियों और झीलों से लेते हैं। खेत बढ़ाने के लिए जंगलों को काटा जा रहा है। इससे जैव विविधता तबाह हो रही है।

  2. डायबिटीज, मोटापा, दिल की बीमारी बढ़ी

    भारत में भोजन का तरीका बिगड़ रहा है, इस वजह से तीन दशक से डायबिटीज, मोटापा और दिल की बीमारी के मरीज तेजी से बढ़े हैं। 1990 से भारत में 28% मौतें इन्हीं बीमारियों की वजह से हो रही हैं।

  3. गलत डाइट से 1.16 करोड़ लोग खतरे में

    भोजन में मांस-डेयरी फूड की अधिकता बनी रही तो दिक्कत और बढ़ेगी। खानपान की गलत आदतों के चलते दुनिया में 1.16 करोड़ मौतें असमय हो सकती हैं। सही डाइट से इनमें से 25% मौतें टाली जा सकती हैं।

समाधान: मौसमी फल-सब्जियों से धरती की सेहत सुधरती है

  1. रिपोर्ट के अनुसार भोजन में प्लांटबेस्ड फूड अधिक और एनिमल सोर्स फूड कम होना चाहिए। भोजन में स्थानीय स्तर पर पाए जाने वाली मौसमी सब्जियां और फलों की मात्रा 50% तो होनी ही चाहिए। बाकी आधा हिस्सा मोटा अनाज, फलियां, नट्स, तेल, एनिमल फूड से लिया जाना चाहिए। ऐसे भोजन पर निर्भर रहने से खेती से होने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी 50% तक की कमी आ सकती है।
  2. थाली से गायब हुए मोटे अनाज

    • चिंता की बात यह है कि उच्च कैलोरी वाले यह परंपरागत मोटे अनाज अब हमारी थाली से गायब हो गए हैं। इसकी खेती पर्यावरण के लिए भी अच्छी है। पर 50 वर्षों में भारत में मोटे अनाजों का रकबा 60% तक घटा है। इसके स्थान पर अब चावल और गेहूं की उपज ज्यादा ली जाने लगी है। जबकि चावल और गेहूं ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं।
    • पानी से भरे धान के खेतों से मीथेन गैस निकलती है। धान के खेतों में पानी भरने के लिए लगातार पंप चलाने पड़ते हैं। इससे भी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। 1990 से 2016 के बीच देश में जितना ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन हुआ, उसमें 16.7% हिस्सा खेती का है। हालांकि यह वैश्विक स्तर से करीब 50% कम है।
    • धान की खेती में अन्य मोटे अनाज की तुलना में 50 गुना ज्यादा पानी लगता है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने सेहत और पर्यावरण को ध्यान में रखकर ‘प्लेनेटरी हेल्थ डाइट’ का खाका तैयार किया है।
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