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मिशन 2019 : केजरीवाल को जो चाहिए था, मिल गया वह बहाना

दिल्ली के मुख्यमंत्री व आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल की राजनीति ही अलग तरीके की है. उन्हें हर कुछ अपने मन मुताबिक ही चाहिए. वरना वे अन्य लोगों पर दोषारोपण करना शुरू कर देते हैं. कांग्रेस ने जब झटका दिया तो उनका आरोप कुछ अजीब तरीके का था. अब इस पर राजनीति गरमाई हुई है.

लोकसभा चुनाव 2019 से पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मिशन 2019 पर पानी फिरता नजर आ रहा है। दिल्ली की 7 लोकसभा सीटों में से अधिकांश सीटें जीतने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल अब पानी पी-पीकर कांग्रेस को कोस रहे हैं। कांग्रेस का भारतीय जनता पार्टी के साथ गुप्त समझौते की बात कर रहे हैं। आखिर यह नौबत क्यों आई? इस पर राजनीतिक विशेषज्ञों और राजनेताओं की अलग-अलग राय है। लेकिन इतना तो मानना पड़ेगा, अरविंद केजरीवाल की राजनीति ही अलग तरीके की है। उन्हें हर कुछ अपने मन मुताबिक चाहिए। वरना वे दूसरे पर दोषारोपण कर खुद को पाक साफ साबित कर देंगे।

 

दिल्ली में पिछले 5 साल में जिस प्रकार से अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति की है। वह इसका बड़ा उदाहरण है। इससे पहले शीला दीक्षित ने भी विपरीत परिस्थितियों में राज्य का शासन चलाया था। लेकिन उनका केंद्र से कभी झगड़ा नहीं रहा। केजरीवाल सरकार का उप राज्यपाल(एलजी) से टकराव ही पिछले 5 साल की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। राजनीति में बदलाव की बात कर सत्ता में बैठने वाले अरविंद केजरीवाल भी अब कुर्सी मोह में ऐसे फंसे हैं कि उन्होंने अपना मूल ही छोड़ दिया है। सोशल मीडिया पर मंगलवार को एक ट्वीट खूब प्रचारित हुआ। केजरीवाल ने एक 2012 में यह ट्वीट किया था कि ‘शीला दीक्षित के घर के बाहर बैठा हूं। सभी साथियों के साथ धरना दे रहा हूं, लेकिन वह नहीं मिल रही।’ स्थिति आज के समय में भी कुछ वैसी ही है। तब वे आंदोलन की राजनीति कर रहे थे। आज राजनीति में वे आंदोलन कर रहे हैं।

 

राजनीतिक विश्लेषकों के माने तो अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव में उच्च स्तर पर सफल होने वाले नहीं हैं, जैसा करिश्मा उन्होंने 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में दिखाया था। तब दिल्ली के 70 में से 67 सीटों पर आम आदमी पार्टी जीती थी। दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। 2019 में भी स्थिति बदलती नहीं दिख रही है। यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए लालायित हैं। कांग्रेस उन्हें भाव नहीं दे रही। अब सवाल उठता है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन क्यों? अगर आप बदलाव की राजनीति करने आए हैं तो अपने मिशन को आगे बढ़ाएं। क्यों आप ऐसे राजनीतिक दल से जुड़ना चाहते हैं, जो आप की विचारधारा के विरुद्ध हो? इसका जवाब एक ही है कि अरविंद केजरीवाल का कोई कोर वोट बैंक नहीं है। वह इस दल के साथ जुड़कर एक वोट बैंक पर कब्जा करने की रणनीति पर काम करना चाहते हैं।

 

कांग्रेस इस चीज को समझ गई है और आम आदमी पार्टी को वन टाइम वंडर बनाने की राह पर चल निकली है। केजरीवाल भी कांग्रेस की रणनीति को जान रहे हैं। छोटे-छोटे राज्यों में भी अगर कांग्रेस गठबंधन करने लगी तो फिर उनका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। राहुल गांधी ने एक मैच्योर फैसला लिया है, जिसका असर भले ही 2019 में न दिखे 2020 के विधानसभा चुनाव में जरूर इसका असर दिखेगा। पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ेगा। वहीं अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव 2019 में वोट बंटने की परेशानी में फंस गए हैं। भाजपा का अपना कोर वोट बैंक है। उसमें सेंध लगाने में अब तक केजरीवाल सफल नहीं हो पाए। वह चाहते थे कि कांग्रेस को अपने साथ लेकर उसके कुल वोट बैंक को अपने में मिलाकर और खुद के स्पार्क से बने एक वोट बैंक को जोड़कर भाजपा को राज्य की राजनीति से बिल्कुल बाहर कर दें। ऐसा संभव होता नहीं दिख रहा है।

 

यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल के मन का नहीं हुआ तो कांग्रेस भाजपा के साथ जाती उन्हें दिखने लगी। ऐसे बयान केजरीवाल की ही मुश्किल बढ़ाएंगे। आप के संस्थापक सदस्य व कवि कुमार विश्वास ने तो इस मामले पर जोरदार तंज कसा है। उन्होंने कहा है कि …तो उन्होंने बिल्कुल मना कर दिया जी। वहीं केंद्रीय मंत्री रिटायर्ड जनरल वीके सिंह ने कहा कि पिछले सप्ताह तक दिल्ली के मुख्यमंत्री कांग्रेस के सामने गठबंधन की भीख मांग रहे थे। आज उन्हें कांग्रेस और भाजपा के बीच गुप्त समझौता हुआ लगता है। यह आदमी चुनाव जीतने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकता है। दरअसल, केजरीवाल जी की राजनीति ही कुछ ऐसी है। वे लगातार कहते रहे हैं सब मिले हुए हैं जी। पिछले दिनों उन्होंने कुछ इसमें बदलाव किया हमसे जो मिला वह ठीक। जो न मिला, वह सब मिले हुए हैं।

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