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मप्र में हजार में 32 बच्चे 29 दिन के भीतर तो 55 पांच साल के पहले तोड़ रहे दम

इंदौर : प्रदेश में जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में 32 बच्चे 29 दिन के पहले और 55 बच्चे जिंदगी का पांचवां साल नहीं देख पाते। देश के 21 बड़े राज्यों में यह मृत्यु दर सबसे ज्यादा है। यह खुलासा राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट से सामने आया है। स्वास्थ्य से जुड़े 23 इंडिकेटर्स के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट में मप्र 17वें स्थान पर है। इसमें सबसे पीछे यूपी, बिहार, उड़ीसा हैं।

नीति आयोग ने ‘हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेसिव इंडिया’ नाम से जून 2019 में जारी रिपोर्ट में राज्यों की रैंकिंग तय की है। रैंकिंग तय करने के लिए रिपोर्ट में, शिशु मृत्यु दर (एनएमआर) और 5 वर्ष से कम बच्चों की मृत्यु दर (यू5एमआर) को भी एक प्रमुख पैमाने के रूप में शामिल किया है। नवजात बच्चों (29 दिन के पहले) की मौत के मामले देखें तो 21 राज्यों में प्रदेश 55 बच्चों के साथ आखिरी पायदान पर है। यानी प्रति 1000 बच्चों में से 55 की मौत 5 साल के पहले हो जाती है। शिशु की मृत्यु दर की गणना करते समय उन बच्चों को शामिल किया जाता है जिनकी मौत जन्म के 29 दिन के भीतर हो जाती है। यहां भी प्रदेश, 32 की शिशु मृत्यु दर के साथ स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में सबसे कमजोर माने जाने वाले उड़ीसा के साथ बराबरी पर है।

प्रदेश में पैदा हुए सौ में से हर सातवें बच्चे का वजन भी कम :
नवजात शिशु के लिए मानक 25 सौ ग्राम रखा गया है। वजन के लिहाज से सबसे स्वस्थ बच्चे जम्मू कश्मीर में पैदा होते हैं। जबकि मप्र में 15 फीसदी यानी 100 में से हर सातवां बच्चा कमजोर वजन का पैदा होता है। यह आंकड़ा अपने आप प्रदेश के एक बड़े इलाके में कुपोषण की कहानी कह रहा है।

केरल से 5 गुना ज्यादा मृत्यु दर :
यह आंकड़ा किसी को भी चौंका सकता है। शिशु मृत्यु दर की बात करें तो केरल में यह प्रति 1000 बच्चों पर मात्र 6 शिशुओं तक सिमट कर रह गई है। जबकि मप्र यह दर 5 गुने से भी ज्यादा यानी 32 है। 29 दिन से लेकर 5 साल से कम बच्चों की मृत्यु के मामले में भी प्रदेश की 55 की मृत्यु दर केरल के 11 के मुकाबले 5 गुना है। यही नहीं यह दर तमिलनाडु ,महाराष्ट्र पंजाब, जम्मू कश्मीर बंगाल के मुकाबले दो से तीन गुनी ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन 2030 तक प्रति 1000 बच्चों पर एनएमआर को 12 और यू5एमआर को 25 तक लाने का लक्ष्य तय किया था। केरल, तमिलनाडु ,महाराष्ट्र, पंजाब ,जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों ने यह लक्ष्य 2016 17 में ही हासिल कर लिया है। जबकि मध्य प्रदेश अभी कोसों दूर है।

स्वास्थ्य सेवा की बदहाली और संस्थागत प्रसव भी बड़ा कारण :
5 साल से पहले बच्चों की मृत्यु दर ज्यादा होने के पीछे आयोग ने स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, संस्थागत प्रसव, डॉक्टर, टीकाकरण की कमी, कुपोषण को प्रमुख कारण बताया है। सीएजी की रिपोर्ट में भी डॉक्टरों और आशा कार्यकर्ताओं की कमी को लेकर सरकार की खिंचाई की जा चुकी है।

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