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पर्पल, ब्लैक और ब्लू- रंग वाले गेहूं की उन्नत किस्में तैयार

नई दिल्ली: भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं की रंगीन और उन्नत किस्म तैयार की है। देश में अब गेहूं केवल भूरे रंग की नहीं होगी। पंजाब के मोहाली में मौजूद नेशनल एग्री-फूड बायॉटेक्नॉलॉजी इंस्टीट्यूट (एनएबीआई) के वैज्ञानिकों ने 8 साल की रिसर्च के बाद गेहूं की तीन रंग- पर्पल, ब्लैक और ब्लू- की किस्में तैयार की हैं। इन्हें फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसआई) ने मानवीय उपभोग के लिए अपनी स्वीकृति दे दी है। अब इन किस्मों की खेती केवल एनएबीआई की लैबोरेटरी और इसके खेत तक सीमित नहीं है। रंगीन गेहूं, विशेषतौर पर पर्पल और ब्लैक वेराइटी की बुआई पंजाब में पटियाला और जालंधर से लेकर मध्य प्रदेश में विदिशा तक 700 एकड़ से अधिक में की गई है। एक वर्ष पहले तक रंगीन गेहूं की खेती केवल 80 एकड़ में प्रयोग के तौर पर की गई थी। एनएबीआई के वैज्ञानिकों का मानना है कि देश के कृषि क्षेत्र में रंगीन गेहूं अगली बड़ी उपलब्धि होगी। गेहूं को इसका रंग एंथोक्यानिन से मिलता है।

यह वह पिगमेंट है जो ब्लूबेरी और जामुन जैसे फलों को रंग देता है। रंगीन गेहूं से आपको एंथोक्यानिन की जरूरी मात्रा मिल सकती है। एंथोक्यानिन एक एंटीऑक्सिडेंट है। गेहूं की नई वेराइटीज में से ब्लैक में एंथोक्यानिन की सबसे अधिक मात्रा है। इसके बाद ब्लू और पर्पल वेराइटी हैं। एनएबीआई में रंगीन गेहूं प्रोजेक्ट की लीड साइंटिस्ट मोनिका गर्ग ने बताया, ‘हमने जापान से जानकारी मिलने के बाद 2011 से इस पर कार्य शुरू किया था। हमने कई सीजन तक प्रयोग करने के बाद इसमें सफलता पाई है।’

एनएबीआई के वैज्ञानिकों का दावा है कि एंटीऑक्सिडेंट की प्रचुर मात्रा वाले गेहूं से ह्रदय रोगों, डायबिटीज और मोटापे की आशंका कम हो जाती है। रंगीन गेहूं से बच्चों में कुपोषण की समस्या से भी निपटा जा सकता है। गर्ग ने कहा, ‘एंथोक्यानिन एक अच्छा एंटीऑक्सिडेंट है, जो हमें सेहतमंद बनाता है। इससे हृदय रोगों और मोटापे जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को रोकने में मदद मिलती है। हमने चूहे पर इसका प्रयोग किया है और यह पाया गया है कि रंगीन गेहूं खाने वालों का वजन बढ़ने की संभावना कम होती है।’

रंगीन गेहूं में कारोबार करने के लिए अभी तक 10 एग्री कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई है। हालांकि, रंगीन गेहूं से बने प्रॉडक्ट्स के मार्केट को लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। सामान्य गेहूं की तुलना में रंगीन गेहूं की यील्ड भी कम है। इस वजह से इसे अधिक कीमत पर बेचना होगा। सामान्य गेहूं की यील्ड प्रति एकड़ 24 क्विंटल की होती है। रंगीन गेहूं की यील्ड प्रति एकड़ लगभग 20 क्विंटल है। इसमें भी ब्लैक वेराइटी की यील्ड 17-18 क्विंटल प्रति एकड़ के साथ सबसे कम है। एनएबीआई के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर टीआर शर्मा ने कहा, ‘रंगीन गेहूं की यील्ड सामान्य गेहूं से कुछ कम है, लेकिन इसमें अधिक एंथोक्यानिनन और जिंक है। इस वजह से यह कुपोषण से निपटने के लिए अच्छी है। सरकार को इसे अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर खरीदना और फिर मिड डे मील में इसे शामिल करना चाहिए।’ रंगीन गेहूं की तीनों वेराइटी का अभी इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) की ओर से परीक्षण किया जा रहा है। इसके बाद देश भर में इसकी खेती शुरू हो सकती है।

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