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नोटबंदी की पहली वर्षगाँठ बुधवार को है। सरकार नोटबंदी का जश्न धूमधाम से मनाने जा रही है। सारे मंत्रियों को हिदायत दी गई है कि मुल्क के कोने-कोने में घूमकर नोटबंदी की ज़रूरत और कालेधन के कत्लेआम के फ़ायदे आमजन को बताएँ। सरकार का यह क़दम काफ़ी सराहनीय है। जनता को मालूम होना चाहिए कि उसने कितना काला धन इकट्ठा करके रखा था, नोटबंदी के बाद उसका काला धन सफ़ेद हो गया। हज़ार-पाँच सौ के पुराने नोट बैंकों में जमा होने से देश की अर्थव्यवस्था को चार नहीं बल्कि आठ चाँद लग गए। हर तरफ़ ख़ुशहाली छा गई, उद्योग-धंधे कई गुना बढ़ गए। घरों में छिपा अरबों रुपए का काला धन सफ़ेद होकर चलायमान हो गया। इसका ज्ञान  पब्लिक को होना चाहिए।
सरकार के प्रचार स्टंट पर किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए। सरकार ने जो फ़ैसला लिया वो देशहित में लिया गया फ़ैसला है। सरकार के कठोर फ़ैसले को स्वीकार किया जाना चाहिए। सरकार के नोटबंदी फ़ैसले पर किसी को टीका-टिप्पणी करने का कोई हक़ नहीं बनता। 
अब सवाल यह उठता है कि नोटबंदी जब सफल साबित हो गई तो मंत्रियों की जमात को नोटबंदी सही साबित करने में क्यों लगाया जा रहा है? मंत्रियों और सांसदों को तो इस काम में लगाया जाना चाहिए कि देश में जितने भी शासकीय अस्पताल और स्कूल-कालेज़ हैं, वहाँ की वास्तविक स्थिति क्या है, अस्पतालों में ग़रीबों का सही इलाज हो रहा या नहीं, मरीज़ों को दवा मिल रही है या नहीं। डाक्टर पर्याप्त संख्या में हैं या नहीं। स्टाफ़ और संसाधन पर्याप्त है या नहीं। स्कूल-कालेज़ में शिक्षण कार्य करने के लिए समुचित शिक्षक हैं कि नहीं। शुद्ध पेयजल और टॉयलेट का इंतज़ाम है या नहीं। छात्र-छात्राओं की सुरक्षा की स्थिति अच्छी है या नहीं।
देश ने साल भर में यह मान लिया है कि नोटबंदी से कालाधन छू हो गया पर यह मानने तैयार नहीं है कि सरकारी अस्पताल और स्कूल-कालेज़ की व्यवस्थाएँ नोटबंदी के बाद चुस्त-दुरुस्त हो गई हैं।
जन अपेक्षा है कि नोटबंदी की सफलता का गुणगान करने के लिए मंत्रियों और सांसदों की तैनाती करने की बजाय इन्हें शासकीय अस्पतालों और स्कूल-कालेज़ों का जायज़ा लेने के लिए तैनात किया जाना चाहिए ताकि सरकार के सामने इन संस्थानों की हक़ीक़त आ सके।
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