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दुनिया का सबसे बड़ा और भयानक नरसंहार जिसमे 100 दिन में 10 लाख लोगों को मारा गया

दुनिया के सबसे बड़े और भयानक नरसंहार के बारे में बताने वाला हूँ। जो की रवांडा में हुआ था। दोस्तों यह नरसंहार इतना ज्यादा भयानक था की इस नरसंहार में मात्र 100 दिन में ही लगभग 10 लाख लोगों की हत्या गयी। दोस्तों ये नरसंहार इतना भयानक था की इसमें बच्चो से लेकर बूढ़ो तक को उनके ही घर में घुसकर पुरे परिवार की हत्या की गयी। और महिलाओं का रेप किया गया। आज भी रवांडा में इस नरसंहार को कोई भी याद नहीं रखना चाहता। 

रवांडा नरसंहार तुत्सी और हुतु समुदाय के लोगों के बीच हुआ एक जातीय संघर्ष था। जो की 6 अप्रेल 1994 में किगली में रवांडा के राष्ट्रपति में हेबिअरिमाना और बुरुन्डियान के राष्ट्रपति सिप्रेन के एक हवाई जहाज के दुर्घटना के बाद शुरू हुआ था। यहां की ज्यादातर आबादी वाले समुदाय हुतु का मानना था की तुत्सी लोगो ने उनके राष्ट्रपति की हत्या कर दी है। जिसके बाद ये संहार शुरू हुआ। करीब 100 दिनों तक चले इस नरसंहार में लगभग दस लाख लोग मारे गए। तब ये संख्या पूरे देश की आबादी के करीब 20 फीसदी के बराबर थी।

 

इस नरसंहार में हूतू जनजाति से जुड़े चरमपंथियों ने अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों और अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया। रवांडा की कुल आबादी में हूतू समुदाय का हिस्सा 85 प्रतिशत है लेकिन लंबे समय से तुत्सी अल्पसंख्यकों का देश पर दबदबा रहा था। साल 1959 में हूतू ने तुत्सी राजतंत्र को उखाड़ फेंका। इसके बाद हज़ारों तुत्सी लोग अपनी जान बचाकर युगांडा समेत दूसरे पड़ोसी मुल्कों में पलायन कर गए। इसके बाद एक निष्कासित तुत्सी समूह ने विद्रोही संगठन रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ़) बनाया। ये संगठन 1990 के दशक में रवांडा आया और संघर्ष शुरू हुआ। ये लड़ाई 1993 में शांति समझौते के साथ ख़त्म हुई। लेकिन ये लड़ाई तुत्सी समुदाय की तरफ से ख़त्म हुई थी। इसके बाद हुतु समुदाय के लोगों ने जो किया वो दिल दहलाने वाला था।

 

दोस्तों हुतु के राष्ट्रपति की मौत प्लेन क्रैश में होने के बाद तो हुतु समुदाय को एक ऐसा बहाना मिल गया जिससे उन्होंने पुरे देश में खून की नदिया बहा दी। हुतु समुदाय के लोगो ने पुरे देश में तुत्सी समुदाय के लोगों को ढूंढ-ढूंढ़कर मारना शुरू कर दिया। हुतु समुदाय के अंदर तुत्सी लोगों के लिए इतनी ज्यादा नफरत हो गयी थी की जिन तुत्सी समुदाय के पड़ोसियों से उनके सालों से मधुर सम्बन्ध थे। उन्हें ही हुतु लोगो ने चुन-चुनकर मारा। यह तक की छोटे बच्चो तक को नहीं बख्सा गया। यही नहीं कुछ हूतू युवकों ने अपनी पत्नियों को भी सिर्फ़ इसलिए ख़त्म कर दिया क्योंकि वो तुत्सी समुदाय से थीं। उनके मुताबिक़ अगर वो ऐसा न करते तो उन्हें जान से मार दिया जाता।

 

दोस्तों उस समय हालत ये थे कि हर व्यक्ति के पास मौजूद पहचान पत्र में उसकी जनजाति का भी ज़िक्र होता था। ताकि तुत्सी लोगो को पहचाना जा सके और उन्हें ख़तम किया जा सके। इसलिए हुतु लड़ाकों ने सड़कों पर नाकेबंदी कर दी जहां चुन-चुनकर तुत्सियों की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। और हज़ारों तुत्सी महिलाओं का अपहरण कर लिया गया और उन्हें सेक्स स्लेव की तरह रखा गया। कहा जाता है की उस वक्त तुत्सी महिलाओ को मारने से पहले उनका रेप करना जरुरी होता था। दोस्तों 100 तक चले इस नरसंहार ने पूरी दुनिया को हिला दिया। लेकिन इस नरसंहार को रोकने के लिए कोई भी देश आगे नहीं आया।

 

हालांकि कुछ समय बाद तूत्सी रिफ्यूजियों की हुतु की सेना पर कब्ज़ा कर लिया और अब बदला लेने की बरी उनकी थी। क्योंकि उनके इरादे भी ठीक नहीं थे। तुत्सी लोगों का सेना पर कब्ज़ा होने के बाद 20 लाख हुतू लोगों को रवांडा छोड़ के भागना पड़ा। जिसमे से कुछ यूगांडा भाग गए और कुछ लोग कांगो में जा के छुपे। इसके बाद दोनों समुदायों में संधि हो गई। सरकार बनी। हुतू प्रेसिडेंट और तूत्सी वाइस प्रेसिडेंट बने। हेबरीमाना की पार्टी जिसने नरसंहार किया था, बैन कर दी गई। नया संविधान बना और पहली बार ढंग से चुनाव हुए। दोस्तों आज भी ये नरसंहार राजनीतिक नफरत के उदाहरण के रूप में लिया जाता है। और सबसे बड़ा नफरत वाला नरसंहार माना जाता है।

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