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दिल्ही की गद्दी किसके हाथ? परिवर्तन या पुनरावर्तन..?

जिसका देश को था इन्तेज़ार आखिर वो घड़ी आ गई। चुनाव आयुक्त द्वारा लोकसभा के आम चुनाव घोषित कर दिए गए। ११ अप्रेल से ले कर १८ मई तक भिन्न भिन्न 7 चरणों में वोट डाले जायेंगे। करीब 90 करोड़ मतदाता है। करीब १० लाख पोलिंग बूथ पर कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान कि प्रक्रिया होंगी। २३ मई को मत गणना होंगी और उसी दिन शाम तक रुझानो से तय हो जायेंगा की किसकी सरकार बनने जा रही है। देश की जनता परिवर्तन करती है या पुनरावर्तन ये परिणाम ही बताएँगे। लेकिन हाल में जो माहोल बना है एयर स्ट्राइक के बाद, उसमे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी की लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई है। २०१४ में भारत के दलों में जो बिखराव था वह अब नहीं। जैसा की यूपी में एक दुसरे के खिलाफ लड़ते आ रहे सपा और बसपा भाजपा और मोदीजी के विरुध्ध एक हो गए। सभी प्रतिपक्ष को ये लग रहा है की भाजपा-मोदीजी के सामने एक नहीं हुए तो भारत की राजनीति में टिकना मुश्किल हो जायेंगा। इसलिए नए नए गठबंधन और महागठबंधन हो रहे है।

२०१४ के चुनाव को देखे तो उस वक्त का माहोल अलग सा था। इस चुना से पहले ऐसी कुछ उथल पाथल देश में हुई की मोदीजी की सरकार का विरोध यानि देश की सेना का विरोध। कोंग्रेस का आरोप की भाजपा सेना पर राजनीति कर रही है। जब की भाजपा का आरोप की कोंग्रेस सेना की कार्यवाही पर शंका जताकर सबूत मांग सेना का अवमान कर रही है। कही रफाल विमान सौदे पर बयानबाजी हो रही है तो कही नोटबंदी का मुद्दा उछल रहा है। आतंकवाद का मुद्दा चुनावों में धीरे धीरे हावी होता नजर आ रहा है। देश की समस्या-मसले कोने में और सेना की कार्यवाही का मुद्दा सेन्ट्रल में आ जाय तो अचरज नहीं। सबूत माँगनेवालों को देशद्रोही तक कहा जा रहा है। रोजगारी का मुद्दा कभी उछला कभी ढीला नजर आ रहा है। २०१४ की तरह इसबार भी सरकार के लिए इस वक्त माहोल उसके पक्ष में कम नजर आ रहा है। २०१४ में यूपीए उभर न पाई। लेकिन एन डी ए में क्या होंगा ये कहना मुश्केल लग रहा है।

भारत का मतदाता बहुत ही चतुर है। सुनेका सब की मतदान करेंगा अपनी तरह से। इस बार पहली बार मतदान करनेवालों की संख्या 8 करोड़ है। चुनावों में सोसियल मिडिया का भी अब महत्व बढ़ गया है। एक और समस्या फेक न्यूज की भी है। चुनाव आयुक्त ने उससे निपटने का प्रयास जरुर किया है। फिर भी मतदाताओं को भ्रमित करे ऐसी पोस्ट सब से पहले कहा किसने किस ग्रुप में क्रिएट की गई ये जानना जरुरी है। चुनाव के दिन या उससे पहले एक भी फेक न्यूज मतदाता और मतदान पर प्रभाव डाल सकता है। सब से बड़ी समस्या ऐसे मतदाताओं की है जो फेक न्यूज परिचित नहीं। सोसियल मिडिया पर कितनी हद तक नकेल कसी जायेंगी ये कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात मुश्किल नहीं और वह ये है की २०१९ के आम चुनाव २०१४ की तुलना में रोचक होंगे।

इसबार न तो १५ लाख का वायदा, न तो अच्छे दिन। इस बार सबूत की राजनीति। दोस्तों को अधिक धनिक बनाने का आरोप, रफाल विमान में एक उद्योगपति को अवांछित आर्थिक लाभ पहुचने का आरोप.. ऐसे कई आरोप प्रत्यारोप लगते लगते आखिर २३ मई कब आ जायेंगी पता ही नहीं चलेंगा। और देखते देखते अगले पांच साल के लिए नई सरकार तैयार हो जायेंगी। लेकिन वह किसकी होंगी ये तो एक दिन का बादशाह…आम मतदाता तय करेंगा। नया देश, नया जनादेश, नई सरकार, नई आशा, नई उमंग के साथ नई तरंग लेकर २६ मई या उसके बाद कौन होंगा प्रधानमंत्री इसके लिए तो इंतेज़ार…इन्तेज़ार और इन्तेज़ार…अब की बार किसकी सरकार…बार बार या अगली बार…?!

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