Monday , June 17 2019
Home / वायरल न्यूज़ / जो पाकिस्तान में जुल्म की शिकार है,हिंदुस्तान से निकली मुसलमानों की वो क़ौम

जो पाकिस्तान में जुल्म की शिकार है,हिंदुस्तान से निकली मुसलमानों की वो क़ौम

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान पर ज़ुल्म हो रहा है.म्यांमार सेना कह रही है कि वो उग्रवादियों को मार रही है. जबकि मीडिया में बच्चों और औरतों की लाशों की तस्वीरें सामने आ रही हैं. एक लाख से ज्यादा रोहिंग्या बांग्लादेश पलायन कर चुके हैं. रोहिंग्या क़ौम की तरह ही कुछ ऐसी और क़ौमें हैं, जो ज़ुल्म की शिकार हैं. उनका अपना देश नहीं.रहने की कोई जगह नहीं है,आज हम बात करने जा रहे है ‘अहमदी’ क़ौम के बारे में

अहमदी ‘मुस्लिम’

हम आपको कम शब्दों में बताना चाहेंगे की अहमदी कॉम वो है जो पैगम्बर मोहम्मद साहब को आखिरी नबी नहीं मानते और न ही कुरान को आखिरी किताब.यही वजह है जगह जगह अहमदी कोम का बहिष्ट्कार हो रहा है,की ये मुस्लमान नहीं है.
साल 2016 पाकिस्तान की एक अहमदी मस्जिद में मोहम्मद साहब का जन्मदिन मनाया जा रहा है,जिसे ईदमिलादुन्नबी का त्यौहार कहते है,ये मस्जिद अहमदी जमात की मस्जिद थी.अपने को पक्का मुसलमान मानने वाले लोगों की भीड़ उस मस्जिद पर टूट पड़ी. मस्जिद पर पथराव किया. गोलियां चलीं. मस्जिद के एक हिस्से में आग भी लगा दी गई.

आखिर क्यों मुसलमानों की ये क़ौम मुसलमानों के हाथों ही जुल्म की शिकार हैं. क्यों इन अहमदियों पर ‘वाजिब-उल-क़त्ल’ के फतवे जारी होते हैं.ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठ रही है तो इस क़ौम पर हो रहे ज़ुल्म को नज़रअंदाज़ करना जायज़ ना होगा. इंसानियत के साथ धोखा होगा.आखिर कहां से शुरू हुई है अहमदी जमात?

अंग्रेजों ने इंडिया को पूरी तरह गुलाम बना लिया था, तारीख 13 फ़रवरी साल 1835 था और पंजाब के लुधियाना में मिर्ज़ा गुलाम अहमद पैदा हुए. उनके पूर्वज दादा के दादा कह लीजिए मिर्ज़ा अमजद हादी 1530 में खानदान समेत अफगानिस्तान के समरकंद से हिजरत करके हिंदुस्तान आ गए और पंजाब के उस इलाके में आकर बस गए जो बाद में कादियान कहलाई. इस खानदान का ताल्लुक तुर्क-मंगोल कबीले से था. मुग़ल बादशाह ज़हीरुद्दीन बाबर ने मिर्ज़ा हादी को उस वक्त कई सौ देहातों की जागीर उन्हें दे दी थी.गुलाम अहमद ने दो शादियां की. पहली हुरमत बीबी थीं, उनसे दो बच्चे हुए. दूसरी बीवी नुसरत जहां बेगम थीं, उनसे चार बच्चे थे.खेतों में फसलें थीं. कटाई शुरू हो चुकी थी. उसी दौरान मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने 23 मार्च 1889 को लुधियाना में हकीम अहमद जान के घर लोगों की पंचायत बुलाई

पंचायत में कुछ ऐसा ऐलान किया,जो मुसलमानो को नागवार गुज़ारना ही था, लोगों से कहा, ‘मोहम्मद आखिरी नबी नहीं हैं. बल्कि मैं खुद नबी हूं’.उन्होंने दावा किया कि मुझे पैगंबर मोहम्मद की तरह अल्लाह से हुक्म मिला है कि मैं तुमसे इस बात बैअत (बात मनवाना) लूं कि मैं नबी हूं.और मुझे अलग जमात बनाने का हुक्म मिला है. इस पंचायत में पहले दिन 40 लोगों ने बैअत ले ली. और इस तरह लुधियाना में पहली अहमदी जमात तैयार हो गई.

इस तरह के दावों को बाकी मुसलमानो ने ख़ारिज कर दिया. उनके मुताबिक हजरत मुहम्मद आखिरी नबी हैं. कुरान आखिरी किताब है, जिसको अल्लाह ने मुहम्मद साहब के जरिए जमीन पर भेजा. और सबसे आखिर में अल्लाह ने सिर्फ मुहम्मद साहब से बात की.

सितंबर 1974 में पाकिस्तानी संविधान में संशोधन किया गया और अहमदी जमात को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया.स्कूल-कॉलेजों से अहमदी स्टूडेंट्स को निकाल दिया गया. हिंसा भड़की. सैकड़ों अहमदी मारे गए और बहुत से ज़ख्मी हुए. इस दौरान हजारों अहमदिया परिवारों को अपना घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा.

पाकिस्तान में अहमदी कम्युनिटी पर कितना ज़ुल्म हुआ, अगर इस बात का अंदाजा लगाना है तो इससे लगता है कि उन्हें ”अस्सलाम अलेकुम” कहने पर जेल में डाल दिया गया. ज़ुल्म की इंतेहा होने पर काफी अहमदियों ने पलायन किया और नॉर्थ इंग्लैंड में बस गए. यहां सबसे ज्यादा अहमदी हैं. मौजूदा दौर में 206 देशों में कई करोड़ अहमदी बताए जाते हैं.

1982 में राष्ट्रपति ज़िया उल हक़ ने संविधान में फिर से संशोधन किया. इसके तहत अहमदियों पर पाबंदी लगा दी गई कि वे ख़ुद को मुसलमान भी नहीं कह सकते. और पैगंबर मुहम्मद की तौहीन करने पर मौत की सजा तय कर दी गई. कब्रिस्तान अलग कर दिए गए. उस वक्त ये मसला भी उठा कि जो अहमदी कब्रिस्तान में दफना दिए गए हैं उनका क्या किया जाए. तब ये ख़बरें भी आईं कि कुछ कब्रों से अहमदियों की लाशों को निकलवा दिया गया.

इस कोम की तादाद की बात करे तो सबसे ज्यादा तादाद पाकिस्तान में है. पकिस्तान में जहां इनकी संख्या 40 लाख से ज़्यादा बताई जाती है वहीं भारत में 10 लाख के करीब अहमदी मुस्लिम हैं. इंडोनेशिया में करीब 4 लाख अहमदी रहते हैं. पाकिस्तान में ज़ुल्म होने की वजह से कई देशों में अहमदी लोगों ने शरण ली है.नाइजीरिया में इनकी संख्या 25 लाख से ज्यादा हैं, जिनमें जर्मनी, तंजानिया, केन्या जैसे देश शामिल हैं. जहां-जहां भी मुस्लिम बहुल देशों में अहमदी लोग रहते हैं, उनका वहां विरोध होता है. क्योंकि ये लोग मुहम्मद साहब को आखिरी नबी (अल्लाह का दूत) नहीं मानते. मुसलमान इसी बात पर इनके खिलाफ रहते हैं. क्योंकि इस्लाम के मुताबिक मुहम्मद साहब ही आखिरी नबी हैं.

साल 1997 में हिंदुस्तान में भी अहमदी जमात पर शिकंजा कसने की तैयारी हुई. देवबंद के दारुल-उलूम ने अहमदियों को काफिर कहे जाने वाले उस फतवे की हिमायत की जो मौलाना अहमद रज़ा ने 1893 में जारी करवाया था. 14 जून को दिल्ली में ऑल इंडिया मजलिस-ए-तहफ्फुज़ खत्म-ए-नबूव्वत के बैनर तले एक कांफ्रेंस हुई और अहमदियों का बहिष्कार करने का ऐलान हुआ.

इससे भी पहले 1993 में हिंदुस्तान में ही अहमदियों के खिलाफ किताबें बांटी गईं.उस दौरान दिल्ली में जमाते अहमदिया के अध्यक्ष अंसार अहमद ने कहा था कि इंडिया में इस विरोध के पीछे पाकिस्तान का हाथ है.और बांटी जा रही किताबें वहीं छपी हैं.उन किताबों में अहमदियों को ”वाजिब-उल-क़त्ल” कहा गया. यानी उनका क़त्ल कर सकते हैं और कोई गुनाह नहीं होगा.

पर क्या इणां होने के नाते ये ज़ुल्म ज़रूरी है? मेरा दीन मेरे साथ.उसका दीन उसके साथ.क्या अहमदियों की इस गलती की सजा हम अल्लाह पर नहीं छोड़ सकते,क्या ये नहीं हो सकता. इसके बदले उन्हें पीटा जाता है. कत्ल किया जाता है. मस्जिदें जलाई जाती हैं.लाखो लोग मर चुके है,और मरे जा रहे है,अपनी खुन्नस निकल कर ऐसे लोग इस्लाम को बदनाम करते है,इस्लाम एक अमन पसंद धर्म है,इसको यु बदनाम ना करे।

Loading...

Check Also

आपको होगा ये फायदा,फेसबुक ने जारी किया नया अपडेट

सार्वजनिक पोस्ट पर बातचीत को और अधिक सार्थक बनाने के लिए फेसबुक ने एक अपडेट ...