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जीएनएस-ख़ास: पुलवामा घटना के बाद सारे मुद्दे हुए गौड़, भाजपा और सरकार की बांछे खिलीं!

नई दिल्ली।   14 फरवरी को पुलवामा में आतंकी हमला होने के बाद से राफेल घोटाले का नाम तक किसी ने नहीं लिया है। राम मंदिर पर भी खामोशी पसरी हुई है। मंहगाई और बेरोजगारी का राग अलापने वाले गूंगे हो चुके हैं। धारा 370 पर सभी मौन साध चुके हैं। जबकि राफेल मामले में शक की सुई सीधे प्रधानमंत्री की तरफ ही जाती है। न तो मुख्यधारा का मीडिया और न ही सोशल मीडिया इसे लेकर कुछ बोल रहा है।

बल्कि हो यह रहा है कि मोदी एक बार फिर कड़ी और खरी बातें बोलने वाले ही-मैन के रूप में स्थापित किए जाने लगे हैं। कहा जाने लगा है कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए मोदी पर भरोसा करना चाहिए। सारे आलोचकों के मुंह बंद किए जा रहे हैं। और अज़हर मसूद के भरोसे मोदी का भाव बढ़ गया है। यानि पुलवामा घटना ने जहां सरकार विरोधियों के मुंह पर ताला लग गया है वहीं भाजपा की बांछे खिली हुई हैं।

पुलवामा घटना और उसके बाद भारत की पाकिस्तान पर किए गए हवाई हमले के बाद भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने सारे विरोधियों के मुंह को बंद कर दिया है। साथ ही भाजपा के मूलभूत चुनावी मुद्दे भी हाशिए पर चले गए। पुलवामा घटना और उसके 10 दिन बाद पाक पर किए गए हवाई हमले के बाद राफेल पर चुप्पी छायी हुई है।

अयोध्या का राम मंदिर का मुद्दा जो आए दिन गर्म मुद्दा बना रहता था वह भी गायब हो चुका है। धारा 370 एक तरह से खत्म हो चुका है। सिविल कोर्ट का मुद्दा भी अब गौड़ हो चुका है। कश्मीरी पंड़ितों का मुद्दा भी गायब है। मंहगाई और बेरोजगारी मुद्दा भी विपक्ष के मुंह से छीन लिया है। अपने खिलाफ प्रचारित होने वाले तमाम राजनीतिक मुद्दों को भाजपा और मोदी सरकार ने इन दिनों गौड़ कर दिया है।

हाल यह है कि भाजपा इस पूरे प्रकरण को अपने पक्ष में भुनाने में लग गयी है। कई कार्यक्रमों में शामिल होने गुजरात गए मोदी के समर्थकों और भाजपा ने कई ऐसे कट आऊट और पोस्टर लगाए जिसमें उन्हें सेना का महानायक स्थापित करने की कोशिश किया गया। जिसका भाजपा के राजनीतिक विरोधियों ने जमकर आलोचना की है। इस बीच प्रधानमंत्री मोदी ने खुद भी माहौल को गर्मा रखा है। ‘जवानों के खून की एक-एक बूंद का बदला लिया जाएगा’ जैसे बयान उछाले जा रहे हैं।

हम बता दें कि इसी तरह 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले के बाद भी भाजपा को लाभ हुआ था। उस समय देश में वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार थी और पूरे विपक्ष ने ताबूत घोटाले को लेकर सरकार की नाक में दम कर रखा था। विपक्ष रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज का इस्तीफा चाहता था। लेकिन संसद हमले के बाद समूचा विपक्ष आतंकवाद के मुद्दे पर सरकार के साथ आ गया और वाजपेयी सरकार को इस सबसे मुक्ति मिल गई।

ऐसा ही कुछ करगिल युद्ध के दौर में हुआ था। उस समय केंद्र में एनडीए सरकार थी जो सिर्फ एक वोट से हार गई थी। लेकिन विपक्ष एकजुट नहीं हो पाया और देश के मध्यावधि चुनावों में जाना पड़ा। करगिल युद्ध को भी ‘नॉन स्टेट एक्टर्स’ का काम बताया गया था। इसके बाद अमेरिका के दखल के बाद पाकिस्तानी सेना बिना चूं-चां किए भारतीय चौकियों से पीछे हट गई थी। भारत ने विजय पताका लहराई और बीजेपी चुनावों में 182 सीटों के साथ फिर से सत्ता में आ गई।

ऐसे और भी बहुत से संयोग हैं। लेकिन बुनियादी सवाल यही है कि ऐसे हमलों के बाद आखिर में सबसे ज्यादा फायदा किसका होता है। भारतीय जनता पार्टी का या फिर भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों का…?

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