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कहानी – आजादी जिस्म की कैद से

सुगंधा अपने जिस्म के आदत से बहुत तंग थी। अकेले वजूद उसे नींद नहीं आती थी। जिस रात सुनील नशा करके और जुआ खेल कर आता था,बहुत देर हो जाती थी। वह अपने के छोटे से दलान में फिरती थी। सुनील गिरता पड़ता जब गए रात लौटता तो उसे सहारा देती। उसे बिस्तर पर लिटाती , कीचड़ भरे उसके जूते उतारती, उसके मुंह से निकलते शराब के बदबूदार द्रव्य को अपने दुपट्टे से पोंछती,उसे नीम बेहोशी की हालत में खाना खिलाती और आंखों में आसूं लिए उसके बेसुध जिस्म से लिपट कर सो जाती,उसे लगता कि सुनील कोई सायादार दरख़्त हो और वह उसके तने से लिपटी कोई बेल हो,जिसका अपना कोई वजूद न हो।

अकेले में उसे नींद नहीं आती थी। शराब के नशे में उसका मर्द दिन में पीटता और गरीबी के लिए जिम्मेदारी उस पर डाल कर गंदी गंदी गालियां देता , पर ज्यों ही रात होती ,उसका जिस्म ऐंठने लगता इसलिए नाराज होकर भी अपने मर्द से दूर नहीं सो सकती थी। उसका जिस्म नशा था जिसके बगैर उसका कलेजा तड़कने लगता था। अपने मर्द से लगकर सोती तो लगता तो आसमान के फैलाव में उसका भी हिस्सा है। सुनील उसे कहता ” अजीब तेरा हौसला है, इतना मार खाती है, जलील होती है, पर रात मेरे बिना नहीं सोती है।”वह कहती ” चांद की कोई रोशनी नहीं होती,वह तो सूरज की रोशनी का मोहताज है,

तभी तो चांद के सामने धरती आ जाने से उसे ग्रहण लग जाता हैं, तू मेरा सूरज है, तेरे जिस्म की गर्मी मुझे नहीं मिलती तो मै बर्फ बनने लगती हूं।” तेरी यह बाते मुझे कभी कभी अच्छी लगती है, वरना अब तक अपनी गरीबी के कारण रेल के पहिए लेट गया होता।” सुनील विचलित सा हो गया। तुम सारा दिन जो मर्जी आए वो करो,मै कभी भी तुमसे कुछ नहीं पूछूंगी, बस अपनी रात मेरे नाम रहने दो मै तुमसे और कुछ नहीं मांगती ।” ” मै छोड़ूंगा ,यह नशा और जुआ, मै अच्छा आदमी बनूंगा,देखना मै तुम्हारे लिए क्या नहीं करूंगा।” सुगंधा जानती थी कि शराब और जुए आज तक किससे छूटा है। सुगंधा का बूढ़ा बाप कभी शराब और

जुआ नहीं छोड़ सका। जुआ खेलते खेलते वह अपनी ही बेटी सुगंधा को सुनील के हवाले कर दिया।सुगंधा ने आंख खोलते ही अपने मां को बाप के हाथों पीटते हुए देखा था। इसलिए पहली बार जब सुगंधा को सुनील ने पीटा तो उसे अचंभा नहीं हुआ, वह समझती थी कि मर्द बस ऐसे ही होते हैं, लिप टा ते भी है, मारते भी है। उसकी सास उसे समझाती “। तू जब तक सुनील को तरसाएगी नहीं,वह तेरी कदर नहीं करेगा। सुगंधा हैरानी से बोलती ” कैसे तरसाऊं अम्मा?”” बस उससे अलग सोया कर, हर रोज उसके साथ न सोया कर।”सुगंधा सास की बातों को समझने की कोशिश करती, कोई बात उसकी समझ में आ भी जाती तो वह भला क्या

करती? उसका जिस्म उसका साथ न देता। कई बार उसने इरादा भी किया, कि सास की अकाध बात पर अमल करके देखे तो सही मगर , ज्योंही रात आती उसका तन बदन हूंमकनेलगता,वह अपनी सास की सारी बातें भूल कर सुनील से लिपट कर सो जाती। वह दुःख से सोचती फिर उसे याद आता कि जब वह छोटी सी थी, तो मां के साथ सोया करती, और जब शराबी बाप उसे देर रात को उसे अलग फर्श पर सुला देता,तब वह बहुत रोती थी। वह अकेले अंधेरी रात से बहुत डरती, डरावने सपने देखती जैसे वह जंगल में है और जंगली जानवर उसका पीछा कर रहे हो, एक दो बार तो उसे निमोनिया हो गया,मुश्किल से जान बची।

फिर बाप ने उसे आंगन में बाहर खाट पर सुला देता और अन्दर से दरवाजा बंद कर देता। कभी रात को उसके बापू नहीं आते तो अपनी मां से खूब लिपट कर सोती। उसका दिल दुआएं मांगता, है भगवान ,उसका बाप कभी पलट कर न आएं। एक दिन पुलिस ने सुनील को उसके साथियों के साथ कचहरी के पीछे जुआं खेलते पकड़ लिया। उसे दो रात जेल में गुजारनी पड़ी। पहली रात तो सुगंधा ने चल फिर कर कटी फटी नींद में गुजार दी। हकीकत थी कि रात वह सुनील से लिपट कर सोती थी और सुबह यों तरो ताजा उठती थी कि चाहो तो पहाड़ कटवा लो उससे। दूसरी रात का अंधेरा फैलते ही सुगंधा हाथ बांध कर बूढ़ी सास के

पास खड़ी हो गईं।” अम्मा, आज की रात सो जा मेरे साथ,वरना न जाने क्या हो जाए। आज मै अकेली सो न सकूंगी।”अम्मा कुछ सोच कर उसके साथ सोने को तैयार हो गई।बूढ़ी अम्मा जब साथ लेटी तो खुद उसे एक अरसे के बाद किसी जिस्म का स्पर्श महसूस हुआ। राख में जैसे किसी ने चिंगारी छेड़ दी हो। उसे अपने जवानी के दिन याद आने लगे।” बहू, जिस्म तो मेरा भी मुंह जोर था,पर मजाल है कि सुनील के बापू मुझे मेरे मर्जी के बिना छू लेता…..मेरे पैर पकड़ता था,तब कहीं जाकर उसे पास आने देती थी,तेरी तरह नहीं थी।” उसके सामने अपनी मां का चेहरा घूम जाता सहमा सहमा हुआ चेहरा। वह सास से बोली ”

तू क्या जाने अम्मा ,मुझे तो जिस्म की गुलामी विरासत में मिली है,मै तो हमेशा से उसकी कैद में हूं। तू समझती है मुझे, मै क्या करूं।”” देख बहू, मैं तो अपने मर्द के हवाले हो जाती थी तो तब भी पूरी की पूरी उसके कब्जे में नहीं होती थी।” अम्मा ख़ामोश हो गई,जैसे रास्ते पर सांस ले रही हो। ” पर क्या फायदा, अगर तन में रूह न हो, तन की सारी बातें तो वहीं होती हैं जिसे पढ़ाकू लोग मोहब्बत कहते हैं।”सुगंधा सोचने लगी कि क्या सुनील से उसको मोहब्बत है। सोच का जायका जैसे उसके जवाब पर उतर आया। शब्द की मिठास तो उसने महसूस किया,पर जिस्म ने उसका अभिप्राय नहीं समझा। वह सोचती रही।

कई दिनों तक बूढ़ी सास की बातों ने उसकी सोच को नया रुख दिया। वह खुद को अजनबी सी लगने लगी। सुनील तीसरे दिन जमानत पर रिहा होकर आ गया। अम्मा की बात उसके एहसास से चिपकी रही। वह मोहब्बत भी क्या जज़्बा है। अंदर ही अंदर आदमी घुलता ,पलता,बढ़ता रहता है। बंदे को पता ही नहीं लगता कि उसके अंदर क्या चल रहा है, और फिर उसके अंदर एक वजूद पलने लगा,परवरिश पाने लगा।वह इश्क में अपनी गिरफ्तार होती चली गई। सुनील के बिना वह अब भी नहीं रहती थी। सुनील को अलबत्ता यह लगता था कि सुगंधा पहली वाली नहीं रही। सुगंधा जिस दुनियां के गिर्द जब फेरे लेती थी

उसमें सुनील झांक भी नहीं सकता था। जिस दिन सुगंधा की सुंदर गुड़िया हुईं,उसके जिस्म में एक अछूत नशा सा छा गया,वह उसमें भीग गई। सुनील समझता था कि यह जजकी की थकावट है।उस रात को वह अपनी बेटी को सीने से लगाए हुए लेटी थी,जब सुनील आकर उससे लिपट कर लेट गया। सुनील के मुंह से बदबू का भभका जब सुगंधा के नथुनों तक पहुंचा तो वह किसी सुहावने सपने से चौंक गई। उसने ना पसंदगी और नफरत से सुनील को इस तरह झटका दिया कि वह फर्श पर गिर पड़ा। वह कमर सहलाते उठा और शराब के नशे मै उसके साथ सोने के लिए वासना से चुर होकर गुड़िया को बाजू से उठाकर नीचे फर्श में

डालना चाहा कि सुगंधा शेरनी की तरह उठ कर बैठ गई और गुर्रा कर बोली “ सुनील ,इस तरह तूने हाथ भी लगाया तो तुम्हारा मुंह नोच लुंगी। जा बाहर आगन में खाट पर सो, मैं अब तेरी कैद से आजाद हो चुकी हु

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