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इंसान भी पानी को परेशान,हलक की आग बुझाने की कोशिश में जान गंवा रहे बेजुबान

पटना. हर साल आने वाली बाढ़ के चलते चर्चा में रहने वाला बिहार इस वर्ष भयंकर सूखे का सामना कर रहा है। स्थिति ऐसी हो गई है कि पानी के लिए जानवर जंगल छोड़ गांव आ रहे हैं। गांव में उन्हें दो घूंट पानी की कीमत जान देकर चुकानी पड़ रही है। औरंगाबाद में प्यास बुझाने के लिए हिरण जंगल से निकलकर गांव आ रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए, जिसमें ग्रामीणों ने हिरण की हत्या कर दी और उसका सींग काट लिया।

पानी की कमी से इंसानों का हाल भी बेहाल है। सासाराम, गया और जमुई जिले के कई ऐसे इलाके हैं जहां लोग नदियों और तालाबों की मिट्टी खोद प्यास बुझाने की कोशिश कर रहे हैं। नालंदा, नवादा, अरवल, गया, जमुई, शेखपुरा, लखीसराय, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा, आरा, बक्सर, वैशाली और कैमूर में जलसंकट सबसे अधिक है।

पानी के लिए सड़क पर उतर रहे लोग
गया और नवादा में पानी की मांग को लेकर लोगों को सड़क पर उतरना पड़ रहा है। मोहड़ा प्रखंड के सारसू पंचायत बीते दो माह से पानी का लेयर नीचे चले जाने के कारण हाहाकार मचा हुआ है।

ऐसी ही स्थिति गुरुआ प्रखंड की है। सीताचुआं गांव के महादलित टोला में पानी का लेयर नीचे चले जाने के कारण पानी के लिए हाहाकार मच गया है। सीताचुआं गांव चाल्हो पहाड़ी के तराई क्षेत्र में बसा होने के कारण निजी चापाकल लगाना कठिन है। पांच सौ की आबादी एक चापाकल से पानी ले रही है। दिन-रात चापाकल के पास भीड़ जुटी रहती है।

चुआड़ी से पानी लाकर बुझाते हैं प्यास 
कैमूर पहाड़ी के ऊपर बसे रोहतास प्रखण्ड के बुधुआ गांव में पेयजल संकट गहरा चुका है। भूमिगत जलस्तर नीचे चले जाने के कारण चापाकल बेकार हो चुके हैं। टैंकरों से जलापूर्ति की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। इस गांव की आबादी लगभग एक हजार है। गांव वालों के समक्ष पीने का पानी एक बड़ी समस्या बन गई है। बुधुआं गांव में आदिवासी आवासीय विद्यालय में 184 बच्चे पढ़ते हैं। विद्यालय में चार चापाकल में तीन बंद हैं। एक चापाकल चालू है, लेकिन इसका पानी पीने योग्य नहीं है। विद्यालय के छात्र और शिक्षक नदी में स्थित एक चुआड़ी से पानी लाकर अपनी प्यास बुझाते हैं।

111 किलोमीटर लंबी किऊल नदी में नहीं एक बूंद पानी
जमुई के 8 प्रखंडों में पानी का भीषण संकट। स्थिति ऐसी हो गई है कि लोगों को पलायन करना पड़ रहा है। जमुई और लखीसराय की लाइफ लाइन किऊल नदी 10 साल बाद एक बार फिर सुखाड़ की चपेट में है। 111 किमी लंबी किऊल में कहीं भी एक भी बूंद पानी नहीं है।

पानी के लिए रतजगा कर रहे लोग
शेखपुरा में जलस्तर नीचे जाने के चलते चापाकलों ने पानी नहीं निकल रहा। शहरी इलाकों में पेयजलापूर्ति पाइप के जरिए पानी पहुंचाने की कवायत हो रही है। यहां लोग पानी भरने के लिए पूरी रात रतजगा कर रहे हैं। कई इलाके ऐसे हैं जहां वाटर टैंकर एक मात्र सहारा हैं।

तबाह हो गया है भू-जल स्तर 
जल संरक्षण के लिए काम करने वाले राजेन्द्र सिंह का कहना है कि बिहार में पानी का यह संकट भू-जल स्तर के तबाह होने के चलते आया है। पिछले एक दशक में हुई अंधाधुंध बोरिंग से भू-जल स्तर तबाह हो गया है। बहुमंजली इमारतों, अपार्टमेंट, मार्केटिंग कांप्लेक्स आदि बड़ी संख्या में निर्माण हुआ और पानी के लिए डीप बोरिंग कराई गईं, लेकिन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाया गया।

भूजल स्तर को लेकर जागरूकता के अभाव में बारिश का पानी ठहरता ही नहीं। सारा पानी नदी-नालों के रास्ते यूं ही बह जाता है। वर्षा जल के भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण 80 फीसदी पानी बेकार बह जाता है। भू-गर्भ जल के अतिदोहन की वजह से भू-गर्भ जलस्तर करीब 10-12 मीटर तक नीचे चला गया है। पिछले दो वर्ष में छह मीटर तक की गिरावट का अनुमान है। अगर भू-गर्भ जल का भंडारण नहीं होगा और इसी तरह से भू-गर्भ जल का दोहन जारी रहा, तो कुछ वर्षों के बाद पीने का पानी भी नहीं मिलेगा। सिंचाई के तरीके में बदलाव की जरूरत है, जिससे पानी की बर्बादी नहीं हो। भू-जल रिचार्ज का सबसे बड़ा साधन तालाब और अन्य परंपरागत जल संसाधन होते हैं। इनके संरक्षण को लेकर सरकार और समाज को जागरूक करने की जरूरत है।

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