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आधा घंटे में कौनसा मेंटेनेंस होता है:कमलनाथ

भोपाल :प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मध्यप्रदेश यूनाइटेड फोरम फॉर पॉवर इंप्लाईज एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल के साथ मंत्रालय में हुई बैठक में सवाल पूछा कि एक घंटा और आधा घंटा बिजली जा रही है। जब फोन लगाओ तो बताया जाता है कि मेंटेनेंस चल रहा है। आप इंजीनियर लोग यहां बैठें हैं बताएं कि आधा घंटे या एक घंटे में कौन सा मेंटेनेंस होता है। मुख्यमंत्री के इस तरह से सवाल पूछने पर इंजीनियर बगले झांकने लगे। मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि घटिया उपकरणों के कारण परेशानी हो रही है। मैं भोपाल में कहीं जा रहा था तो देखा खंबे पर स्पार्किंग हो रही है, यह बिजली का घाटा है। ट्रांसमिशन, डिस्ट्रीब्यूशन लॉस को कम करने की अलग-अलग योजना बनाकर दें।

हम सभी को लागू करेंगे। बैठक में पदाधिकारियों ने कहा कि 15 साल में पहली बार हमें किसी मुख्यमंत्री ने बुलाकर बात की है। इस दौरान मुख्य सचिव एसआर मोहंती, अपर मुख्य सचिव ऊर्जा आईसीपी केशरी सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे। सीएम ने कहा कि ट्रिपिंग हो फॉल्ट या फिर कोई अन्य वजह हो पर यह बिजली जा रही है। बिजली कटौती को लेकर खुफिया से लेकर सभी रिपोर्ट मेरे पास है। इसे खारिज मत करो। सरकार को आपकी वजह से सबसे ज्यादा आलोचना का शिकार होना पड़ा है। आपकी जो भी समस्याएं हैं, उन्हें हल करने के लिए हम तैयार हैं पर उपभोक्ताओं की संतुष्टि सरकार की पहली प्राथमिकता है। इससे कोई समझौता नहीं किया जाएगा। इस दौरान एसोसिएशन की ओर से भरोसा दिलाया गया कि तमाम समस्याओं के बावजूद हम पूरी तत्परता से काम में लगे हैं, ताकि बिजली की आपूर्ति में कोई दिक्कत न हो।
बैठक में मुख्यमंत्री ने बिजली सरप्लस है और कटौती भी हो रही है, यह बात समझ में नहीं आती है।

कटौती को लेकर तमाम रिपोर्ट हमारे पास हैं, इसे खारिज मत करो। इस पर बिजली इंजीनियर और कर्मचारियों ने कहा कि सर, हम इंकार नहीं कर रहे हैं। स्टाफ की कमी है। कई समस्याएं हैं।बैठक में इंजीनियर और कर्मचारियों ने संविदा कर्मचारियों को नियमित करने और बिजली खरीदी से जुड़े मुद्दे पर बात रखी तो मुख्यमंत्री ने कहा कि हम यह कर देते हैं तो क्या जो चल रहा है वो दुरुस्त हो जाएगा। फिर गलत हो गया तो, ऐसा नहीं चलेगा। आपकी कंपनी और विद्युत मंडल, यह कैसे आत्मनिर्भर बने, ऐसे प्रोजेक्ट बनाकर दें। मुख्यमंत्री ने उनसे पूछा कि मांग और आपूर्ति आपस में समान क्यों नहीं दिख रही है। इस पर एक पदाधिकारी ने कहा कि 2010 में पूर्ववर्ती सरकार हम पर दबाव डालती थी कि मांग बढ़ाकर रखो, ताकि बिजली खरीद सकें। दरअसल, प्रदेश में उत्पादित बिजली और आपूर्ति में जो बड़ा अंतर था उसे निजी बिजली कंपनियों के साथ हुए करार और अन्य जगहों से खरीदकर पूरा किया जाता था। मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि सरकार लगभग 15 हजार करोड़ रुपए की सबसिडी बिजली कंपनियों को देती है। इसके बाद भी घाटा बना हुआ है। आखिर यह राशि जाती कहां है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में असंतोष है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आपके द्वारा की गई क्षति की गणना में खोट है। इसके लिए ऐसा करें कि कितनी यूनिट बिजली हुई और कितनी राशि आई, यह देखें। इससे वास्तविक नुकसान का अंदाज लगेगा।

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